अल्बर्ट आइन्स्टाइन का सामान्य सापेक्षता सिद्धांत


-प्रदीप ( pk110043@gmail.com )

अल्बर्ट आइन्स्टाइन द्वारा प्रतिपादित ‘सापेक्षता सिद्धांत’ को वैज्ञानिक चिन्तन की दुनिया में एक सुंदर एवं परिष्कृत सिद्धांत के रूप में देखा जाता है। अब यह सिद्धांत भौतिकी का आधार स्तम्भ बन चुका है। बिना इस सिद्धांत के आधुनिक भौतिकी उसी तरह से असहाय है, जिस प्रकार बिना अणुओं-परमाणुओं की अवधारणाओं के। पेटेंट ऑफिस में एक क्लर्क की हैसियत से कार्य करते हुए आइन्स्टाइन ने सैद्धांतिक भौतिकी के जितने व्यापक सिद्धांत पर कार्य किया, उसे देखकर आश्चर्य होता है। सन् 1901 से आइन्स्टाइन ने प्रत्येक वर्ष अपने कार्यों को जर्मन पत्रिका ‘ईयर बुक ऑफ़ फिजिक्स’ (अन्नालेन डेर फिज़िक) में प्रकाशित करवाया। रोचक तथ्य यह है कि आइन्स्टाइन को उस समय समकालीन विज्ञान-साहित्य का अधिक ज्ञान भी नही था।

Albert_Einstein
अल्बर्ट आइन्स्टाइन

सन् 1905 में जब आइन्स्टाइन मात्र 26 वर्ष  के थे, उन्होंने चार शोधपत्र प्रकाशित करवाये, जिसने क्वांटम यांत्रिकी और सापेक्षता सिद्धांत की नींव रखी। ये वही शोध पत्र थे जिसने सैद्धांतिक भौतिकी को झकझोरकर रख दिया। उनमें से एक शोधपत्र बहुत लम्बा था। उस शोध-पत्र का नाम था- ‘ऑन दी इलेक्ट्रो-डायनोमिक्स ऑफ़ मूविंग बॉडीज’ (On the electrodynamics of moving bodies)। यही वह शोध पत्र है, जिसने मानव की वैज्ञानिक संकल्पना ही बदल दी। वास्तव में यह सापेक्षता के विशेष सिद्धांत (Theory of Special Relativity) का विवरण था। आइन्स्टाइन का यह सिद्धांत हमारी दिक्-काल से संबंधित परम्परागत धारणाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। इसमें एक सीधी रेखा में एकसमान गति से गतिशील प्रेक्षकों/वस्तुओं का विवेचन किया गया है। विशेष सापेक्षता सिद्धांत निम्न दो उपधारणाओं (Postulates) पर आधारित है-

  1. हमारे दैनंदिन अनुभव हमें दिखाते हैं कि सीधी तथा एकसमान वेग से चलने वाली गाड़ी में वस्तुओं की गति स्थिर गाड़ी में वस्तुओं की गति से बिलकुल भी अलग नहीं होती है। अतः एक-दूसरे से सापेक्ष सीधी और समरूप गति से चलने वाली सभी प्रयोगशालाओं में पिंड की गति भौतिकी के समान नियमों का पालन करती है। इसे गति की सापेक्षता भी कहते है।
  2. इस उपधारणा के अंतर्गत आइन्स्टाइन ने यह माना कि प्रकाश का वेग हमेशा स्थिर रहता है तथा स्रोत अथवा प्रेक्षक की गति का उस पर कोई प्रभाव नही पड़ता।

विशेष सापेक्षता सिद्धांत के कई दूरगामी निष्कर्ष निकले, जिसने मानव चिन्तन को गहराई से प्रभावित किया। इस सिद्धांत के प्रमुख निष्कर्ष एवं प्रभाव हैं- समय-विस्तारण (Time Dilation), लम्बाई का संकुचन (Length-contraction), वेग के साथ-साथ द्रव्यमान का परिवर्तन आदि। चूँकि वर्ष 1905 में आइन्स्टाइन ने भौतिकी के व्यापक सैद्धांतिक ढांचें को प्रस्तुत किया था, इसलिए इस वर्ष को  भौतिकी में ‘चमत्कारी वर्ष’ के नाम से जाना जाता है।

विशेष सापेक्षता सिद्धांत एक-दूसरें के सापेक्ष सरल रेखाओं में तथा एकसमान वेगों से गतिशील प्रेक्षकों/वस्तुओं  के लिए ही लागू होती है, परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न भी उठ सकता है कि यदि किसी वस्तु की गति जब अ-समान, तीव्र अथवा धीमी होने लगे, या फिर सर्पिल अथवा वक्रिल मार्ग में घूमने लगे, तो क्या होगा ? यह प्रश्न आइन्स्टाइन के मस्तिष्क में विशेष सापेक्षता सिद्धांत के प्रकाशन के दो वर्ष पश्चात् कौधनें लगा। आइन्स्टाइन के जिज्ञासु स्वभाव ने अपने सिद्धांत का और विस्तार कर ऐसे त्वरणयुक्त-फ्रेमों में विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जिन्हें एक-दूसरें के सापेक्ष त्वरित किया जा सकता हो। आइन्स्टाइन ने विशेष सापेक्षता सिद्धांत के पूर्व मान्यताओं को कायम रखते हुए तथा त्वरित गति को समाहित करते हुए ‘सामान्य सापेक्षता सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) को आज से 100 वर्ष पहले 25 नवंबर, 1915 को ‘जर्मन ईयर बुक ऑफ़ फ़िजिक्स’ में प्रकाशित करवाया। सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को ‘व्यापक सापेक्षता सिद्धांत’ भी कहतें हैं। इस सिद्धांत में आइन्स्टाइन ने गुरुत्वाकर्षण के नये सिद्धांत को समाहित किया था। इस सिद्धांत ने न्यूटन के अचर समय तथा अचर ब्रह्माण्ड की संकल्पनाओं को समाप्त कर दिया। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह सिद्धांत ‘सर्वोत्कृष्ट सर्वकालिक महानतम बौद्धिक उपलब्धि’ हैं। दरअसल बात यह है कि इस सिद्धांत का प्रभाव, ब्रह्माण्डीय स्तर पर बहुत व्यापक हैं।

वस्तुतः हम पृथ्वी पर आवास करतें हैं, जिसके कारण हम ‘यूक्लिड की ज्यामिती’ को सत्य मानतें हैं, परन्तु दिक्-काल में यह सर्वथा असत्य है। और हम पृथ्वी पर अपनें अनुभवों के कारण ही यूक्लिड की ज्यामिती को सत्य मानतें हैं, और सामान्य सापेक्षता सिद्धांत यूक्लिड के ज्यामिती से भिन्न ज्यामिती को अपनाती हैं। इसलिए सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को समझना आशा से अधिक चुनौतीपूर्ण माना जाता रहा है।

इस सिद्धांत की गूढ़ता के बारे में एक घटना विख्यात है। सापेक्षता सिद्धांत को मानने वाले शुरुआती व्यक्तियों में सर आर्थर एंडिग्टन (Sir Arthur Eddington) का नाम विशिष्ट माना जाता है। उनके बारे में एक भौतिक-विज्ञानी ने तो यहाँ तक कह दिया था- ‘‘सर आर्थर! आप संसार के उन तीन महानतम व्यक्तियों में से एक हैं जो सापेक्षता सिद्धांत को समझते हैं।’’ यह बात सुनकर सर आर्थर कुछ परेशान हो गये। तब उस भौतिक-विज्ञानी ने कहा- ‘‘इतना संकोच करने की क्या आवश्यकता है सर ?’’ इस पर सर आर्थर ने कहा-‘‘संकोच की बात तो नही है किन्तु मैं स्वयं सोच रहा था कि तीसरा व्यक्ति कौन हो सकता है ?’’

ऐसा ही एक मजाक कुछ वर्ष पूर्व इंटरनेट पर बहुत लोकप्रिय था, जोकि स्मिथ नामक एक प्रोफेसर के बारे में था। ‘‘प्रोफेसर स्मिथ ने लोगों को सापेक्षता सिद्धांत को सरल भाषा में समझाने के लिए एक पुस्तक की रचना की।’’ किसी ने उस पुस्तक के बारे में लिखा था- ‘‘प्रोफेसर स्मिथ आइन्स्टाइन से भी अधिक प्रतिभावान हैं। जब आइन्स्टाइन ने सर्वप्रथम सापेक्षता सिद्धांत की व्याख्या की थी तब सम्पूर्ण विश्व में मात्र बारह वैज्ञानिकों ने उनके सिद्धांत को समझा था। परंतु जब प्रोफेसर स्मिथ उसकी व्याख्या करते हैं तो एक भी व्यक्ति नही समझ पाता है।’’

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत ‘समतुल्यता के नियम’ (Equivalence Principle) पर आधारित है, और इसके अनुसार गुरुत्वाकर्षण बल प्रकाश के ही वेग से गतिमान रहता है। समतुल्यता के नियम को समझने के लिए कल्पना कीजिये कि भौतिकी से संबंधित प्रयोग के लिए पृथ्वी पर एक बंद कमरा है तथा अन्तरिक्ष में त्वरित करता हुआ (9.8 मीटर/से.) एक अन्य  कमरा है, दोनों ही कमरे प्रयोग करने के लिए एकसमान होंगें। दरअसल, आइंस्टाइन ने समतुल्यता के नियम के ही द्वारा यह सिद्ध किया कि त्वरण एवं गुरुत्वाकर्षण एक ही प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसके लिए उन्होनें प्रसिद्ध ‘लिफ्ट एक्सपेरिमेंट’ नामक वैचारिक प्रयोग का सहारा लिया।

सर्वप्रथम आप यह कल्पना कीजिये कि एक लिफ्ट है, जो किसी इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर है। लिफ्ट के तार को काट दिया जाता है और लिफ्ट स्वतंत्रतापूर्वक  नीचें गिरने लगता है। जब लिफ्ट गिरने लगेगा तो उसमे सवार लोगों पर  भारहीनता का प्रभाव पड़ेगा, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से अन्तरिक्ष यात्री अन्तरिक्ष यान में सवार हो करके करते हैं। उस समय पृथ्वी की ओर बेरोकटोक तीव्र गति से गिरने का अनुभव होगा। यदि कोई व्यक्ति जो लिफ्ट के अंदर उपस्थित हों और लिफ्ट के बाहर का कोई दृश्य न देख सके तो  उसका अनुभव ठीक उसी प्रकार से होगा, जिस प्रकार से अन्तरिक्ष यात्रियों को होता हैं। कोई भी व्यक्ति यह नही बता सकता हैं कि लिफ्ट में जो घटनाएँ घटी, वह गुरुत्वाकर्षण के कारण घटी हैं अथवा त्वरण के कारण। अत: सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार त्वरण तथा गुरुत्वाकर्षण मूलतः एक ही प्रभाव उत्पन्न करतें हैं तथा इनकें बीच अंतर स्पष्ट करना असम्भव हैं।

वास्तविकता में, आइन्स्टाइन के सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण एक बल नही हैं, बल्कि त्वरण तथा मंदन का कारक हैं एवं सूर्य के नजदीक ग्रहीय-पथ एवं ग्रहों के निकट उपग्रहीय-पथ को वक्रिल बनाता है। किसी अत्यंत सहंत पिंड के इर्दगिर्द दिक्-काल वक्र हो जाता है। वस्तुतः अब यह पुरानी मान्यता हो चुकी है कि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसके इर्दगिर्द ग्रह दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करतें रहतें हैं, बल्क़ि यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि सूर्य का द्रव्यमान अपने इर्दगिर्द के दिक्-काल (space-time) को वक्र कर देता हैं। और दिक्-काल की वक्रता के ही कारण चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

दिक्-काल वक्रता

इस भौतिक विश्व में हम जिन  घटनाओं को घटित होते हुए देखतें हैं, वह दिक् (अन्तरिक्ष) के तीन आयामों लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई से निर्मित होता है। मगर, सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार दिक् के तीन आयामों के अतिरिक्त साथ में चौथा आयाम ‘समय’ भी जुड़ता हैं। और ये चारों आयाम जुड़कर ‘दिक्-काल सांतत्यक’ (Spacetime Continuum) का निर्माण करते हैं।

आइंस्टाइन द्वारा प्रतिपादित इस नवीन सिद्धांत की सहायता से उस समस्या का भी सुनिश्चित स्पष्टीकरण मिला, जिसकों लेकर भौतिकविद् बहुत लम्बें समय से शंकित थे। समस्या थी- सूर्य के समीप स्थित ग्रह बुध के कक्षा में विचलन। न्यूटन के नियमों के अनुसार इस विचलन को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता था। अंतर केवल थोड़ा ही था। आइंस्टाइन ने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के द्वारा इस समस्या का भी समाधान निकाल लिया, उनके अनुसार प्रत्येक शताब्दी में 43 सेकेण्ड का विचलन अतिरिक्त होनी चाहियें; और यह विचलन निरीक्षणों से मेल खाता था। और इस तरह ही आइन्स्टाइन ने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का प्रथम प्रमाण स्वयं प्रस्तुत कर दिया।

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत ने एक और भविष्यवाणी की, कि अत्यंत प्रबल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से आने वालें प्रकाश में अभिरक्त विस्थापन (Red-shift) होना चाहिये, जोकि न्यूटन के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। विस्तृत खगोलीय निरीक्षणों द्वारा प्रबल गुरुत्वीय क्षेत्र से आने वाले प्रकाश में अभिरक्त विस्थापन पाया गया, जोकि आइन्स्टाइन के सिद्धांत के कलन से सटीकता से मेल खाता था।

29 मार्च, 1919 के खग्रास सूर्य ग्रहण के अवसर पर ब्रिटेन के खगोलविदों के एक दल, जिसका नेतृत्व सर आर्थर स्टेनली एडिंग्टन कर रहे थे, ने पश्चिमी अफ्रीका (प्रिंसिप) और ब्राजीलियाई नगर सोबर्ल  में सूर्य ग्रहण के चित्र उतारे। सामान्य सापेक्षता के अनुसार, जब तारों का प्रकाश सूर्य के प्रबल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से गुजरेगा तो उसे थोडा सा मुड़ जाना चाहिये यानी तारे अपने स्थान से विस्थापित नज़र आने चाहिये। आइन्स्टाइन के अनुसार, लगभग 1.75 कोणीय सेकेण्ड का विस्थापन होना चाहिए, जबकि एडिंग्टन के दल ने लगभग 1.64 कोणीय सेकेण्ड का विस्थापन मालूम किया। वर्ष 1952 में एक अमेरिकी अभियान ने अत्यंत सूक्ष्मग्राही उपकरण से 1.70 कोणीय सेकेण्ड का विस्थापन ज्ञात किया। और बाद के भी अभियानों में भी कुछ इसी प्रकार के परिणाम प्राप्त हुए। दिलचस्प बात यह है कि ये सभी परिणाम आइन्स्टाइन के पूर्वनिर्धारित भविष्यवाणी को बिलकुल सत्य सिद्ध करते हैं। इस प्रभाव को आज ‘गुरुत्वीय लेंसिग’ (Gravitational lensing) के नाम से जाना जाता है।

गुरुत्वीय लेंसिंग

जब आइंस्टाइन को यह पता चला कि उनके इस निष्कर्ष की पुष्टि प्रायोगिक तौर पर हो चुकी हैं, तो उन्होनें अपने प्रिय मित्र मैक्स प्लांक को एक पत्र में लिखा : ‘‘इस दिन तक मुझें जीवित रख कर के भाग्य ने मुझ पर विशेष कृपा की है…’’ । आइंस्टाइन के इस सिद्धांत को न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के बाद दुनिया का सबसे बड़ा आविष्कार माना जाता है। इसके बाद आइन्स्टाइन इस विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन गए और बच्चा-बच्चा उनसे परिचित हो गया। आज भी जब कोई बच्चा भौतिकी अथवा गणित में ज्यादा अच्छी रूचि दिखाता हैं, तो हम उसे स्नेहपूर्वक ‘हेल्लो यंग आइंस्टाइन’ कहकर के सम्बोधित करते हैं।

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का एक और पूर्वानुमान था कि यदि किसी अतिसहंत पिंड की गति में त्वरण आता है, तो वह अन्तरिक्ष में लहरे एवं हिचकोले उत्पन्न करेगा जो उस पिंड से दूर गति करेंगी। ये लहरे दिक्-काल में वक्रता उत्पन्न करती हैं। इन लहरों को अब वैज्ञानिक ‘गुरुत्वीय तरंगे’ (Gravitational Waves) कहते हैं। इन तरंगों की गति प्रकाश की गति के जितनी होती है, ये प्रकाश तरंगों के समान ही होती हैं। ब्रह्मांड का प्रत्येक त्वरणशील खगोलीय पिंड गुरुत्वीय तरंगों को उत्पन्न करता है। जिस खगोलीय पिंड का द्रव्यमान अधिक होता है, वह उतनी ही अधिक प्रबल गुरुत्वीय तरंगे उत्पन्न करता है। हमारी पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से त्वरित होकर एक वर्ष की अवधि में सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करती है। इस कारण से सूर्य के चारों तरफ की कक्षा में पृथ्वी की गति गुरुत्वीय तरंगे उत्पन्न करती है। परन्तु पृथ्वी की यह गति बहुत धीमी है और हमारी पृथ्वी का द्रव्यमान भी इतना कम है कि इससे उत्पन्न होने वाली दुर्बल गुरुत्वीय तरंगों का प्रेक्षण करना लगभग असम्भव है।

सर्वप्रथम वर्ष 1974 में दो खगोल-वैज्ञानिकों जे. एच. टेलर और आर. ए. हल्स ने अप्रत्यक्ष रूप से गुरुत्वीय तरंगों को पकड़ने में सफलता हासिल की। दरअसल, इन दोनों वैज्ञानिकों ने एक-दूसरे की परिक्रमा करने वाले दो न्यूट्रोन तारों (पल्सर) की खोज की थी। ये दोनों जो अत्यधिक द्रव्यमान एवं सघनता वाले तारे हैं, एवं एक-दूसरे की परिक्रमा अत्यधिक वेग से कर रहे हैं। अत्यंत तीव्र गति से परिक्रमा करने के कारण ये अल्प मात्रा में गुरुत्वीय तरंगे भी उत्सर्जित कर रहें हैं। गुरुत्वीय तरंगों के उत्सर्जन से हो रही ऊर्जा की हानि इन तारों को एक-दूसरे की ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही है।  इससे इन तारों के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम हो रही है। जब इसकी गणना की गई तो यह कमी आइन्स्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के पूर्णतया अनुरूप मिली। यह गुरुत्वीय तरंगों की उपस्थिति का एक अप्रत्यक्ष प्रमाण था। सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की इस पुष्टि के लिए टेलर और हल्स को वर्ष 1993 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

वैज्ञानिकों ने हाल ही में गुरुत्वीय तरंगों का प्रथम प्रत्यक्ष अवलोकन किया। इसे वैज्ञानिक सदी की ‘सबसे बड़ी खोज’ मान रहे हैं। गुरुत्वीय तरंगों की खोज की इस योजना को ‘लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी’ (Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory) या लीगो (LIGO) नाम दिया गया है। लीगो की सहायता से वैज्ञानिकों ने दूर स्थित दो कृष्ण विवरों के बीच हुई हालिया टक्कर से उत्सर्जित गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाया है।

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत ने विगत 25 नवंबर, 2015 को शानदार सौ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। यह सिद्धांत पूरे एक शताब्दी से विभिन्न वैज्ञानिक कसौटियों पर खरा उतरता आया है और आज भी मानव मस्तिष्क का महानतम बौद्धिक सृजन बना हुआ है।

 

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गलत, यानी कितना गलत?


लेखक:   आइज़ेक एसीमोव

एक दिन मुझे एक खत मिला। घसीटमार हैंडराइटिंग में लिखे इस खत को पढ़ना काफी कठिन साबित हुआ। बहरहाल, मैंने इसे पढ़ने की भरसक कोशिश की, यह सोचकर कि शायद यह महत्वपूर्ण हो। पहले ही वाक्य में लेखक ने मुझे सूचित किया था कि वह अँग्रेज़ी साहित्य में स्नातक शिक्षा ले रहा है, मगर उसका ख्याल है कि वह मुझे थोड़ा विज्ञान सिखा सकता है (मैंने एक निश्वास छोड़ी क्योंकि मेरी जानकारी में अँग्रेज़ी साहित्य के बहुत ही कम छात्र थे जो मुझे विज्ञान सिखा सकते हैं। अलबत्ता, मैं अपने अज्ञान की विशालता से भी वाकिफ हूँ और किसी से भी सीखने को तैयार रहता हूँ। तो मैंने पढ़ना जारी रखा)।
समझ में यह आया कि अपने अनगिनत लेखों में से किसी एक में मैंने इस बात पर खुशी ज़ाहिर की थी कि मैं एक ऐसी सदी का बाशिन्दा हूँ जहाँ हमने अन्तत: इस ब्रह्माण्ड की बुनियाद को पकड़ लिया है।

अवधारणाओं का विकास

मैं मामले की गहराई में नहीं गया था मगर मेरा आशय यह था कि अब हमें इस ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाले बुनियादी नियम मालूम हैं और उसके मोटे-मोटे घटकों के बीच के गुरुत्वीय अन्तर्सम्बन्धों की जानकारी है, जैसा कि 1905 से 1916 के बीच विकसित सापेक्षता सिद्धान्त में स्पष्ट हुआ है। हमें उप-परमाण्विक कणों और उनके बीच की अन्तर्क्रियाओं के नियम भी पता हैं – इनका निहायत साफ-सुथरा विवरण 1900 से 1930 के दरमियान विकसित क्वांटम सिद्धान्त में हुआ है। और तो और, हमने यह भी पता कर लिया है कि निहारिकाएँ और निहारिका पुंज भौतिक ब्रह्माण्ड की बुनियादी इकाइयाँ हैं, जैसा कि 1920 और 1930 के बीच खोजा गया था। आप देख ही सकते हैं कि ये सब बीसवीं सदी की खोजें हैं।
धरती चपटी होने की परिकल्पना के साथ यह भी विचार था कि आकाश एक खोखले अर्धगोले की तरह है जिस पर सूरज-चाँद-तारे जड़े हुए एक अक्ष के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हैं। अर्धगोले को घूमाने वाला यंत्र क्षितिज के पार है। 16वीं सदी में बनाए गए इस चित्र में दिखाया गया है कि कोई इन्सान चपटी धरती के किनारे तक पहुँच कर आकाश से सिर बाहर निकालकर आकाश को घुमाने वाले यंत्र को निहार रहा है।

अँग्रेज़ी साहित्य के नौजवान विशेषज्ञ ने मेरा उद्धरण देने के बाद मुझे इस बाबत अच्छा खासा व्याख्यान दे डाला था कि हर सदी के लोगों ने माना है कि अन्तत: उन्होंने ब्रह्माण्ड को समझ लिया है और अगली ही सदी में वे गलत साबित हुए हैं। इसका मतलब है कि अपने आधुनिक ‘ज्ञान’ के बारे में हम एक ही बात पक्के तौर पर कह सकते हैं कि वह गलत है। इसके बाद नौजवान ने अनुमोदन के स्वर में सुकरात का उद्धरण प्रस्तुत किया था – जब सुकरात को पता चला था कि डेल्फी के किसी विद्वान ने उन्हें (सुकरात को) यूनान का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति घोषित किया था, तो सुकरात ने कहा था, “यदि मैं सबसे बुद्धिमान व्यक्ति हूँ, तो इसलिए कि मैं अकेला व्यक्ति हूँ जो यह जानता है कि मैं कुछ नहीं जानता।” नौजवान का आशय यह था कि मैं निपट मूर्ख हूँ क्योंकि मैं इस मुगालते में हूँ कि मैं बहुत कुछ जानता हूँ।

उस नौजवान को मेरा जवाब था, “जॉन, जब लोगों ने सोचा कि धरती चपटी है, तो वे गलत थे। जब लोगों ने सोचा कि धरती गोलाकार है तो वे गलत थे। मगर यदि तुम्हें ऐसा लगता है कि धरती को गोलाकार मानना उतना ही गलत है जितना उसे चपटी मानना, तो तुम्हारा विचार उन दोनों से ज़्यादा गलत है।”
देखा जाए तो बुनियादी दिक्कत यह है कि लोगों को लगता है कि ‘सही’ और ‘गलत’ निरपेक्ष बातें हैं; कि जो बात नितान्त और पूरी तरह सही नहीं है, वह पूरी तरह और बराबर मात्रा में गलत है।

अलबत्ता, मुझे लगता है कि ऐसा नहीं है। मेरा ख्याल है कि सही और गलत थोड़े धुँधले विचार हैं। इस आलेख में मैं यही समझाने का प्रयास करूँगा।
जब मेरा अँग्रेज़ी साहित्य विशेषज्ञ मित्र कहता है कि हर सदी में वैज्ञानिक सोचते हैं कि उन्होंने ब्रह्माण्ड का खाका खींच लिया है और वे हमेशा गलत होते हैं, तो मैं यह जानना चाहता हूँ कि वे कितने गलत थे। क्या वे हर बार उतनी ही हद तक गलत थे? एक उदाहरण लेते हैं।

सभ्यता के शुरुआती दिनों में आम एहसास यह था कि धरती चपटी है। यह एहसास इसलिए नहीं बना था कि लोग बेवकूफ थे, न ही इसलिए बना था कि वे लोग बेहूदा बातों पर यकीन करने पर अड़े थे। उन्होंने उम्दा प्रमाणों के आधार पर ही माना था कि धरती चपटी है। बात सिर्फ इतने पर नहीं टिकी थी कि ‘दिखती तो ऐसी ही है’ क्योंकि धरती चपटी नहीं दिखती। पहाड़ों, वादियों, बीहड़ों, दर्रों वगैरह के चलते यह निहायत ऊबड़-खाबड़ नज़र आती है।

यह तो सही है कि सीमित क्षेत्रों में सपाट मैदान हैं और यहाँ धरती की सतह अपेक्षाकृत चपटी नज़र आती है। ऐसा ही एक मैदान दज़ला-फरात (टिग्रिस-यूफ्रेट्स) इलाके में है जहाँ पहली ऐतिहासिक सभ्यता (लिखाई समेत) पनपी थी। यह सभ्यता सुमेर की थी।
हो सकता है कि मैदानों के इस नज़ारे ने सुमेर के अक्लमन्द निवासियों को यह सामान्यीकरण मानने को विवश किया हो कि धरती चपटी है: अर्थात् यदि आप किसी तरह से सारे उभार और गड्ढों को समतल कर दें, तो आपको जो धरती मिलेगी वह चपटी होगी। इस धारणा को इस बात से बल मिला होगा कि विशाल जलराशियाँ (तालाब और झीलें) शान्त दिनों में सपाट ही नज़र आती हैं। 

इसी सवाल को एक अलग ढंग से भी पूछा जा सकता है: पृथ्वी की सतह की गोलाई या वक्रता कितनी है? यदि काफी लम्बी दूरी को देखें, तो पृथ्वी की सतह पर्फेक्ट सपाटपन से (औसतन) कितनी विचलित होती है? चपटी-धरती का सिद्धान्त कहेगा कि धरती की सतह सपाटपन से लगभग बिलकुल भी विचलित नहीं होती; सतह की वक्रता शून्य प्रति मील है।
यह सही है कि आजकल हमें पढ़ाया जाता है कि चपटी-धरती का सिद्धान्त गलत है; पूरी तरह गलत है, भयानक रूप से गलत है, सर्वथा गलत है। मगर ऐसा नहीं है। धरती की वक्रता लगभग शून्य प्रति मील ही है। अर्थात्, हालाँकि, चपटी-धरती का सिद्धान्त गलत है मगर यह लगभग सही है। और इसीलिए यह सिद्धान्त इतने समय तक चलता रहा।

चपटी धरती – कुछ चुनौतियाँ

यकीनन, ऐसे कई कारण थे जिनके चलते चपटी-धरती का सिद्धान्त असन्तोषप्रद था। 300 ईसा पूर्व के आसपास यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने इन कारणों का सार प्रस्तुत किया था। पहला, जब आप उत्तर की ओर यात्रा करते हैं, तो कुछ तारे दक्षिण गोलार्ध की तरफ ओझल होते जाते हैं। और यदि आप दक्षिण की ओर बढ़ें तो तारे उत्तरी गोलार्ध की तरफ ओझल होते जाते हैं। दूसरा, चन्द्र ग्रहण के समय चाँद पर पृथ्वी की छाया हमेशा एक वृत्त के चाप के रूप में होती है। और तीसरा, पृथ्वी पर भी जहाज़ चाहे किसी भी दिशा में दूर जाएँ, क्षितिज में उनका निचला भाग सबसे पहले ओझल होता है।
समुद्री जहाज़ को आते या जाते हुए देखने, या चन्द्रग्रहण के दौरान दिखाई देने वाली पृथ्वी की छाया। कुछ ऐसे अवलोकन थे जिन्होंने धरती के चपटे आकार से आगे जाकर सोचने का कौतुहल जगाया।
यदि धरती की सतह चपटी है तो उपरोक्त तीनों में से किसी भी अवलोकन की ठीक-ठाक व्याख्या नहीं हो सकती मगर धरती को गोलाकार मान लिया जाए तो इन्हें समझा जा सकता है।
इसके अलावा, अरस्तू का विश्वास था कि सारे ठोस पिण्डों में एक साझा केन्द्र की ओर गति करने की प्रवृत्ति होती है। ज़ाहिर है, यदि कोई ठोस ऐसा करेगा तो वह गोलाकार हो जाएगा। किसी पदार्थ का एक निश्चित आयतन तब अपने केन्द्र के औसतन सबसे नज़दीक होता है जब वह गोलाकार हो, बनिस्बत किसी भी अन्य आकृति के।
अरस्तू के लगभग एक सदी बाद यूनानी दार्शनिक इरेटोस्थेनीज़ ने देखा कि अलग-अलग अक्षांशों पर सूर्य द्वारा बनाई गई छायाओं की लम्बाई अलग-अलग होती है (यदि धरती चपटी होती तो सारी छायाएँ एक बराबर लम्बाई की होतीं)। छाया की लम्बाई में अन्तर के आधार पर इरेटोस्थेनीज़ ने धरती के गोले के डील-डौल की गणना की; पता चला कि पृथ्वी के गोले की परिधि 25,000 मील है।
इतने बड़े गोले की वक्रता लगभग 0.000126 प्रति मील होती है। यह आँकड़ा शून्य प्रति मील के बराबर ही है और प्राचीन काल में उपलब्ध तकनीकों की मदद से इसे नापना शायद ही सम्भव होता। 0.000126 और शून्य के बीच फर्क बहुत महीन है, उसी की वजह से चपटी धरती को गोल करने में इतना समय लगा था।

ध्यान देने की बात यह है कि शून्य और 0.000126 के बीच का नगण्य-सा अन्तर भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। यह अन्तर बढ़ता जाता है। यदि इस अन्तर का ध्यान न रखा जाए, और पृथ्वी की सतह को चपटी की बजाय गोल न माना जाए, तो बड़ी दूरी के लिए पृथ्वी के नक्शे नहीं बनाए जा सकते। इसी प्रकार से यदि धरती को गोलाकार न माना जाए, तो समुद्र में अपनी स्थिति को जानने का कोई ठीक-ठाक तरीका न होगा और लम्बी समुद्री यात्राएँ असम्भव हो जाएँगी।

एक और बात यह है कि धरती को चपटी मानने में यह धारणा निहित है कि या तो वह अन्तहीन होगी या फिर उसकी सतह का कोई ‘अन्तिम किनारा’ होगा। मगर गोलाकार धरती की धारणा में धरती एक ऐसी चीज़ है जो अन्तहीन तो है, मगर साथ ही सीमित भी है। और बाद में हुई सारी खोजें सीमित धरती के साथ मेल खाती हैं।
तो, हालाँकि चपटी-धरती सिद्धान्त बहुत कम गलत है और इसके आविष्कारकों की तारीफ की जानी चाहिए, मगर साथ ही यह इतना गलत तो है ही कि गोलाकार धरती के हक में इसे खारिज किया जाए।

नाशपाती, नारंगी या गोला

अलबत्ता, क्या धरती एक गोला है? जी नहीं, धरती एक गोला नहीं है। कम-से-कम सही गणितीय मायने में तो नहीं है। गोले के कुछ गणितीय गुणधर्म होते हैं – मसलन, सारी त्रिज्याओं की लम्बाई बराबर होती है (त्रिज्या मतलब वे सारी रेखाएँ जो उसकी सतह के एक बिन्दु से शु डिग्री होकर उसके केन्द्र से गुज़रते हुए सतह के किसी अन्य बिन्दु पर पहुँचती हैं)।
यह बात धरती पर लागू नहीं होती। धरती की विभिन्न त्रिज्याओं की लम्बाई अलग-अलग होती है।
लोगों को यह विचार कैसे आया कि धरती एक सच्चा गोला नहीं है? दूरबीन के शुरुआती दिनों में, मापन की सटीकता की सीमाओं के अन्दर, सूरज और चाँद की आउटलाइन पर्फेक्ट वृत्त नज़र आती थीं। यह अवलोकन इस धारणा से मेल खाता है कि चाँद और सूरज पर्फेक्ट गोलाकार हैं।

मगर जब दूरबीन से अवलोकन करने वाले पहले-पहले प्रेक्षकों ने बृहस्पति और शनि को देखा तो तुरन्त स्पष्ट हो गया कि उन ग्रहों की आउटलाइन पर्फेक्ट वृत्त नहीं हैं। इसका मतलब हुआ कि बृहस्पति और शनि सच्चे गोले नहीं हैं।
सत्रहवीं सदी के अन्तिम वर्षों में आइज़ेक न्यूटन ने दर्शाया कि कोई भी विशाल पिण्ड गुरुत्वाकर्षण बलों के प्रभाव से एक गोला बन जाएगा (ठीक यही बात अरस्तू ने भी कही थी) मगर तभी जब वह घूर्णन न कर रहा हो। यदि वह घूर्णन कर रहा है तो एक अभिकेन्द्री (centripetal) बल लगने लगेगा जो पिण्ड के पदार्थ को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध बाहर की ओर उठाएगा। जैसे-जैसे आप भूमध्य (विषुवत्त) की ओर बढ़ेंगे, यह प्रभाव बढ़ता जाएगा। गोलाकार पिण्ड की घूर्णन गति बढ़ने पर भी यह प्रभाव बढ़ता है। और बृहस्पति तथा शनि सचमुच बहुत तेज़ गति से घूर्णन करते हैं।
बृहस्पति या शनि की तुलना में पृथ्वी बहुत धीमे घूर्णन करती है। लिहाज़ा, प्रभाव भी कम होगा मगर होगा ज़रूर। पृथ्वी की वक्रता का वास्तविक मापन अठारहवीं सदी में किया गया था और न्यूटन सही साबित हुए थे।

दूसरे शब्दों में, पृथ्वी में भूमध्यरेखीय उभार है। या कह सकते हैं कि पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी दबी हुई है। यह गोलाकार न होकर एक पिचका हुआ गोला है (नारंगी समान)। इसका मतलब है कि पृथ्वी की विभिन्न त्रिज्याओं की लम्बाई में अन्तर है। सबसे बड़ी त्रिज्याएँ वे हैं जो भूमध्य रेखा पर सतह के किसी बिन्दु से शु डिग्री होकर भूमध्य रेखा के सम्मुख बिन्दु को जोड़ती हैं। यह ‘भूमध्यरेखीय त्रिज्या’ 12,755 कि.मी. लम्बी है। सबसे छोटी त्रिज्या उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से जोड़ती है। यह ‘ध्रुवीय त्रिज्या’ 12,711 कि.मी. लम्बी है।
सबसे लम्बी और सबसे छोटी त्रिज्या के बीच का अन्तर 44 कि.मी. है और इसका मतलब है कि पृथ्वी का नारंगीपन (यानी सच्चे गोले से भटकाव) 44/12755 या 0.0034 है। यह 1 प्रतिशत का एक-तिहाई है।
इसी बात को दूसरे ढंग से देखें, तो किसी सपाट सतह पर हर जगह वक्रता शून्य प्रति कि.मी. होती है। पृथ्वी की सतह पर वक्रता हर जगह 0.000126 प्रति मील (या 8 इंच प्रति मील) है। नारंगीनुमा पृथ्वी पर वक्रता का मान 7.973 इंच प्रति मील से लेकर 8.027 इंच प्रति मील के बीच बदलता है।

गणितीय आधार पर धरती कोई मुकम्मल गोला नहीं है। धरती का भूमध्यरेखीय व्यास 12755 कि.मी. है जबकि ध्रुवीय व्यास 12711 कि.मी. है, यानी दोनों व्यास में 44 कि.मी. का अन्तर है। यह फोटोग्राफ सेटेलाइट द्वारा पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र के अध्ययन के दौरान खींचा गया है।

गोलाकार से दबे हुए गोलाकार तक पहुँचने के लिए जितने करेक्शन की ज़रूरत पड़ती है वह उस करेक्शन के मुकाबले बहुत कम है जो चपटी धरती से गोलाकार धरती की यात्रा में ज़रूरी था। अर्थात्, सही मायने में तो गोलाकार धरती की धारणा गलत है, मगर यह उतनी गलत नहीं है जितनी कि चपटी धरती की धारणा।

और थोड़ी सख्ती बरतें, तो कहना पड़ेगा कि नारंगीनुमा गोलाकार धरती की धारणा भी सही नहीं है। 1958 में उपग्रह वेनगार्ड-1 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था। यह उपग्रह पृथ्वी के स्थानीय गुरुत्वाकर्षण – और उसके आधार पर पृथ्वी की आकृति – का मापन अभूतपूर्व सटीकता से कर सकता था। पता यह चला कि भूमध्यरेखीय उभार भूमध्य रेखा के दक्षिण की ओर थोड़ा ज़्यादा है बनिस्बत उत्तर की ओर। साथ ही यह भी पता चला कि उत्तरी ध्रुव की समुद्र सतह के मुकाबले दक्षिणी ध्रुव की समुद्र सतह पृथ्वी के केन्द्र के थोड़ी ज़्यादा नज़दीक है।
इसको बयान करने का एकमात्र तरीका यही है कि पृथ्वी नाशपाती के आकार की है। और लोगों ने अविलम्ब यह निर्णय किया कि पृथ्वी गोलाकार न होकर अन्तरिक्ष में टँगी एक रसीली नाशपाती है। वास्तव में, नारंगीनुमा गोले से नाशपाती के बीच का अन्तर कि.मी. में नहीं मीटरों में है। इसकी वजह से वक्रता में जो फर्क पैदा होता है वह प्रति मील में इंच के दस लाखवें भाग के बराबर है।

मुख्तसर बात यह है कि मेरा अँग्रेज़ी साहित्य विशेषज्ञ मित्र सर्वथा सही और सर्वथा गलत की ख्याली दुनिया का वासी है जो शायद मानता है कि चूँकि सारे सिद्धान्त गलत हैं, इसलिए हो सकता है आज जिस पृथ्वी को गोलाकार माना जा रहा है, उसे अगली सदी में घनाकार, फिर उससे अगली सदी में एक खोखला चतुष्फलक और आगे चलकर शायद डोनट के आकार का माना जाएगा।
दरअसल, होता यह है कि जब वैज्ञानिकों के हाथ कोई अच्छी अवधारणा लग जाती है तो वे इसे परिष्कृत करते जाते हैं और ज़्यादा बारीकी से लागू करते जाते हैं। यह काम मापन के उपकरणों में सुधार के साथ सम्भव होता है। सिद्धान्त गलत नहीं बल्कि अधूरे होते हैं।

भूकेन्द्री-सूर्यकेन्द्री मॉडल

यह बात पृथ्वी के आकार ही नहीं, कई अन्य मामलों में भी दर्शायी जा सकती है। जब ऐसा लगता है कि कोई नया सिद्धान्त क्रान्तिकारी है, तब भी वास्तव में, वह छोटे-छोटे परिष्कारों के ज़रिए ही उभरा होता है। यदि छोटे-छोटे परिष्कारों से ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत होती, तो पुराना सिद्धान्त ज़्यादा समय तक टिक ही नहीं पाता।
कॉपरनिकस ने एक भू-केन्द्रित सौर मण्डल को छोड़कर सूर्य-केन्द्रित सौर मण्डल को अपनाया था। ऐसा करते हुए वे एक प्रत्यक्ष दिखने वाली चीज़ को छोड़कर एक ऐसी चीज़ को अपना रहे थे जो हास्यास्पद नज़र आती थी। अलबत्ता, यह आकाश में ग्रहों की गति की गणनाओं को बेहतर बनाने का मामला था, और अन्तत: भू-केन्द्रित सिद्धान्त पीछे छूट गया। पुराना सिद्धान्त (यानी भूकेन्द्रित सिद्धान्त) इतने लम्बे समय तक टिका रहा तो इसलिए कि वह उस समय के मापन के मापदण्डों के तहत काफी बढ़िया नतीजे देता था।

एक और उदाहरण देखें। पृथ्वी की भौगोलिक संरचनाएँ इतनी धीमी रफ्तार से बदलती हैं और यहाँ रहने वाले जीव इतनी धीमी रफ्तार से विकसित होते हैं कि शुरुआत में यह मानना ठीक ही था कि कोई परिवर्तन नहीं होता है और पृथ्वी और जीवन हमेशा से वैसे ही रहे हैं, जैसे आज हैं। यदि यह सही है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पृथ्वी और जीवन अरबों वर्ष पुराने हैं या हज़ारों वर्ष पुराने हैं। हज़ारों को समझना कहीं ज़्यादा आसान लगता था।

मगर जब सावधानीपूर्वक किए गए अवलोकनों ने दर्शाया कि पृथ्वी और जीवन बहुत धीमी रफ्तार से बदलते रहते हैं, तो यह स्पष्ट हो गया कि पृथ्वी और जीवन बहुत प्राचीन होने चाहिए। आधुनिक भूविज्ञान अस्तित्व में आया और साथ ही जैविक विकास की धारणा भी।

यदि बदलाव की रफ्तार ज़्यादा तेज़ होती तो भूविज्ञान और जैव-विकास की धारणा प्राचीन काल में ही अपने आधुनिक स्वरूप तक पहुँच चुकी होती। सृष्टिवादी आज भी यदि अपनी कपोल-कल्पनाओं का ढिंढोरा पीटते रह सकते हैं, तो सिर्फ इसलिए कि एक अचर विश्व में बदलाव की रफ्तार और एक विकासोन्मुख विश्व में बदलाव की रफ्तार के बीच जो अन्तर है वह शून्य और लगभग शून्य के बीच है।
चूँकि, सिद्धान्तों में परिष्कार का परिमाण कम-से-कम होता जाता है, इसलिए अति-प्राचीन सिद्धान्त भी इतने सही तो रहे ही होंगे कि उनमें प्रगति की गुंजाइश थी: यह प्रगति ऐसी है कि हर नया परिष्कार अपने से पहले किए गए परिष्कार का सफाया नहीं करता।
मसलन, यूनानियों ने पृथ्वी की गोलाई पर ध्यान दिए बगैर ही अक्षांश और देशांश की धारणा प्रस्तुत की थी और भूमध्य सागर क्षेत्र के ठीक-ठाक नक्शे बनाए थे, हम आज भी अक्षांश और देशांश का इस्तेमाल करते हैं।

सुमेरवासियों ने शायद सबसे पहले यह सिद्धान्त स्थापित किया था कि आकाश में ग्रहों की गतियों में नियमितता होती है और इनका पूर्वानुमान किया जा सकता है। वे पूर्वानुमान के तरीके भी विकसित कर पाए थे, हालाँकि, वे मानते थे कि पृथ्वी ही ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है। उनके मापों में बहुत सुधार हुए हैं मगर सिद्धान्त वही है।
ज़ाहिर है, हमारे पास जो सिद्धान्त हैं उन्हें मेरे अँग्रेज़ी साहित्यकार मित्र के सरलीकृत अर्थ में गलत माना जा सकता है, मगर कहीं अधिक सटीक व परिष्कृत मायने में उन्हें सिर्फ अधूरा माना जाना चाहिए।


आइज़ेक एसीमोव: बीसवीं शताब्दी में विज्ञान को लोगों तक पहुँचाने में जिन वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है – उनमें से एक हैं आइज़ेक एसीमोव। विज्ञान गल्प को भी वे नईऊँचाइयों तक लेकर गए। उन्होंने बहुत-सी पुस्तकें लिखीं हैं, जिनकी कुल संख्या सैकड़ों में होगी।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।

 साभार : शैक्षणिक सन्दर्भ अंक-84

 

विचित्र खगोलीय पिंड : कृष्ण विवर (Black hole)


 by:- Pradeep kumar

कृष्ण विवर
कृष्ण विवर

सदियों से ब्रह्माण्ड मानव को आकर्षित करता रहा हैं। ब्रह्माण्ड की कई संकल्पनाओं ने मानवीय मस्तिष्क को हजारों वर्षों से उलझन में डाल रखा हैं। वर्तमान में  वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के सुदूर स्थित सूक्ष्म एवं स्थूलकाय सीमाओं तक पहुंच चुके हैं। ब्रह्माण्डीय परिकल्पनाओं एवं प्रेक्षणों द्वारा खगोलविदों को ब्रह्माण्ड के विचित्रताओं और रहस्यों के सबंध में पता चला। जैसे-जैसे ब्रह्माण्डीय संकल्पनाओं एवं पिंडों के बारे में हमारे ज्ञान में वृद्धि होती गईं, वैसे-वैसे और अधिक विचित्रताएँ हमारे सामने आती गईं।  ब्रह्माण्ड की  इन्हीं विचित्रताओं में से एक विचित्रता विशिष्ट  हैं, जो वर्तमान में  जिज्ञासुओं के मध्य चर्चा का प्रमुख कारण हैं – कृष्ण विवर अर्थात ब्लैक होल (Black Hole)। आपके समक्ष प्रस्तुत इस लेख में हम इन्हीं कृष्ण विवरों के संबंध में चर्चा करने जा रहें हैं, जिसकें गुणधर्म बहुत विचित्र  होते हैं।

कृष्ण विवर अत्यधिक घनत्व तथा द्रव्यमान वाले ऐसें पिंड होते हैं, जो  आकार में बहुत छोटे होते हैं। इसके प्रबल गुरुत्वाकर्षण के चंगुल से  प्रकाश की किरणों का भी निकलना असम्भव होता हैं। चूँकि इससे प्रकाश की किरणें भी बाहर नहीं निकल पाती हैं, अत: यह हमारें लिए अदृश्य बना रहता हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कृष्ण विवरों के अस्तित्व में होने  के संबंध  में सर्वप्रथम सुझाव वर्ष 1783 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मिशेल (John Michell) ने, उस समय के ज्ञात सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण  सिद्धांत के आधार पर प्रस्तुत किया था। मिशेल के अनुसार एक अत्यंत सघन एवं अतिसहंत तारा, जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होगा कि उससें प्रकाश की किरणों का भी निकलना असम्भव हो जाएगा। तारे से उत्सर्जित होने वाली प्रकाश की किरणें अधिक दूर जाने से पहले ही तारे का गुरुत्वाकर्षण उसे अपनीं सतह पर वापस खींच लेगा। खगोलविद ऐसे सघन पिंडो को अब ‘कृष्ण विवर’ या ‘ब्लैक होल’ कहते हैं। मिशेल के अनुसार हम इसे देख तो नही सकेंगे, परन्तु इसके गुरुत्वीय प्रभाव को अवश्य अनुभव कर सकेंगे। उनकें अनुसार ब्रह्माण्ड में बहुत बड़ी संख्या में ऐसें तारे (कृष्ण विवर) विद्यमान हो सकतें हैं।

कृष्ण विवर (Black hole)
कृष्ण विवर (Black hole)

मिशेल के सुझाव के बाद वर्ष 1796 में, फ़्रांसीसी वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास ने अपनीं पुस्तक ‘द सिस्टम ऑफ़ द वर्ल्ड’ (The System of the World) में मिशेल से अलग एवं स्वतंत्र रूप से कहा था कि अत्यंत कम क्षेत्र में अधिक द्रव्यमान वाले पिंड के गुरुत्वाकर्षण के कारण  प्रकाश की किरणों का भी निकलना असम्भव होगा। लाप्लास के तर्क को  समझने  लिए सर्वप्रथम हमे यह समझना होगा कि पलायन वेग (Escape velocity) किसी ग्रह या तारे के लिए क्यों महत्वपूर्ण होता  हैं। हम किसी वस्तु को ऊपर की ओर जितने  अधिक वेग से फेंकते हैं, वह उतनी ही अधिक ऊंचाई तक ऊपर जाती हैं। यदि पृथ्वी पर हम एक गेंद को ऊपर फेंकते हैं, तो यह पृथ्वी पर वापस गिर जाता हैं। यदि एक निश्चित वेग सीमा को लांघकर एक रॉकेट को प्रक्षेपित करें, तो वह पृथ्वी के गुरुत्व-क्षेत्र को पार करके अन्तरिक्ष में पलायन कर जाएगा तथा पृथ्वी पर वापस नही आएगा। इस न्यूनतम वेग-सीमा को ‘पलायन वेग’ या ‘निर्गम वेग’ कहतें हैं। पृथ्वी की सतह से पलायन वेग लगभग 11.2 कि.मी./सेकेण्ड हैं। ध्यातव्य हैं कि किसी पिंड का गुरुत्वाकर्षण जितना अधिक होता हैं, उतना ही उसका पलायन वेग भी अधिक होता हैं। चूँकि कृष्ण विवरों का गुरुत्वाकर्षण अत्यधिक प्रबल होता हैं, इसलिए इसका पलायन वेग प्रकाश के वेग से भी अधिक होता हैं। पलायन वेग अत्यधिक होने के कारण प्रकाश सहित अन्य रेडियो तरंगे, एक्स-रे इत्यादि इसके प्रबल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से निकलने में असमर्थ होती हैं।

लाप्लास ने अपने तर्क में कहा था कि यदि किसी तारे का द्रव्यमान और उसके त्रिज्या  का अनुपात अत्यधिक हो, तो पलायन वेग प्रकाश की गति से भी अधिक होगा और इस स्थिति में तारे से प्रकाश की किरणें उत्सर्जित नही हो पायेंगी क्योंकि उसका गुरुत्व-क्षेत्र अत्यंत  प्रबल होगा।   लाप्लास ने अपनी पुस्तक के तीसरे संस्करण में इस मत को त्याग दिया क्योंकि उन्नीसवीं सदी में न्यूटन के कणिका-सिद्धांत को समर्थन नही प्राप्त हो रहा था, उस समय यह माना जाता था कि प्रकाश द्रव्यमान रहित तरंग हैं, इसलिए यह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से मुक्त रहता हैं। दरअसल तरंग सिद्धांत से यह स्पष्टीकरण नही दिया जा पा रहा था, कि प्रकाश गुरुत्वाकर्षण बल से कैसे  प्रभावित होगा। गुरुत्वाकर्षण बल  किस प्रकार से प्रकाश को प्रभावित करता हैं इस संबंध में तब तक कोई उपयुक्त सिद्धांत सामने नही आया जबतक बीसवीं सदी के आरम्भिक काल में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अत्यंत प्रभावशाली सैद्धांतिक विचार  ‘सामान्य सापेक्षता सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) का  प्रतिपादन न कर दिया।

कैसे बनते हैं कृष्ण विवर?

कृष्ण विवरों का निर्माण किस प्रकार से होता हैं, यह जानने से पहलें, तारों के  विकासक्रम को समझना आवश्यक होगा। एक तारे का विकासक्रम आकाशगंगा (Galaxy) में उपस्थित धूल एवं गैसों के एक अत्यंत विशाल मेघ (Dust & Gas Cloud)  से आरंभ होता हैं। इसे ‘नीहारिका’ (Nebula) कहते हैं। नीहारिकाओं के अंदर हाइड्रोजन की मात्रा सर्वाधिक होती है और 23 से 28 प्रतिशत हीलियम तथा अल्प मात्रा में कुछ भारी तत्व होते हैं।

जब गैस और धूलों से भरे हुए मेघ के घनत्व में वृद्धि होती है। उस समय मेघ अपने ही गुरुत्व के कारण संकुचित होने लगता है। मेघ में संकुचन के साथ-साथ उसके केन्द्रभाग के ताप एवं  दाब में भी वृद्धि हो जाती है। अंततः ताप और दाब इतना अधिक हो जाता है कि हाइड्रोजन के नाभिक आपस में टकराने लगते हैं और हीलियम के नाभिक का निर्माण करनें लगतें हैं ।  तब तापनाभिकीय संलयन (Thermo-Nuclear Fusion) आरंभ हो जाता है। तारों के अंदर यह अभिक्रिया एक नियंत्रित हाइड्रोजन बम विस्फोट के समान होती हैं। इस प्रक्रम में प्रकाश तथा ऊष्मा  के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह मेघ ऊष्मा व प्रकाश से चमकता हुआ तारा बन जाता है। तापनाभिकीय संलयन से निकलीं प्रचंड ऊष्मा से ही तारों का गुरुत्वाकर्षण संतुलन में रहता हैं, जिससें तारा अधिक  समय तक स्थायी बना रहेगा।

अंतत: जब तारे का दाना-पानी (हाइड्रोजन तथा अन्य नाभिकीय ईंधन) खत्म हो जायेगा, तो उसे अपनें गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करने के लिए पर्याप्त ऊष्मा नही प्राप्त हो पायेगा। जिसके कारण तारा ठंडा होने लगेगा। वर्ष 1935 में भारतीय खगोलभौतिकविद् सुब्रमण्यन्  चन्द्रशेखर (Subrahmanyan Chandrasekhar) ने यह स्पष्ट कर दिया, कि अपने ईंधन को समाप्त कर चुके सौर द्रव्यमान से 1.4 गुना द्रव्यमान वाले तारे, जो अपने ही गुरुत्व के विरुद्ध स्वयं को नही सम्भाल पाता हैं। उसके बाद  तारे के अंदर  एक विस्फोट होता हैं, जिसे अधिनवतारा विस्फोट कहा जाता हैं।  विस्फोट के बाद  यदि उसका  अवशेष बचता हैं, तो वह अत्यधिक घनत्वयुक्त  ‘न्यूट्रान तारा’ (Neutron star) बन जाता हैं। आकाशगंगा में ऐसे बहुत से तारे होते हैं जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना से भी अधिक होता हैं। ऐसे तारों पर गुरुत्वीय खिचांव अत्यधिक होने के कारण तारा संकुचित होने लगता हैं, और दिक्-काल (Space-Time) विकृत होने लगती हैं, परिणामत: जब तारा किसी निश्चित क्रांतिक  सीमा (Critical limit) तक संकुचित हो जाता हैं, और अपनें ओर के दिक्-काल को इतना अधिक झुका लेता हैं कि अदृश्य हो जाता हैं। यही वे अदृश्य पिंड होते हैं जिसे अब हम ‘कृष्ण विवर’ या ‘ब्लैक होल’ कहतें हैं। अमेरिकी भौतिकविद् जॉन व्हीलर (John Wheeler) ने वर्ष 1967 में पहली बार इन पिंडो के लिए ‘ब्लैक होल’ (Black Hole) शब्द का उपयोग किया।

यदि पृथ्वी के पदार्थों का घनत्व लाखों-करोंड़ों गुना अधिक हो जाए तथा इसके आकार को संकुचित करके 1.5 सेंटीमीटर छोटी  कर दिया जाए तो ऐसी अवस्था में प्रबल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी भी प्रकाश- किरणों को उत्सर्जित नही कर सकेगी और यह एक कृष्ण विवर बन जाएगी।  किसी भी कृष्ण विवर में द्रव्यमान की तुलना में घनत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण होता हैं क्योंकि घनत्व, द्रव्यमान और मात्रा का अनुपात होता है। यदि सूर्य को संकुचित करकें इसकी 700,000 किमी०  त्रिज्या को  3 किमी० में परिवर्तित कर दिया जाए, तो इसकी परिणति कृष्ण विवर के रूप में होगी। हम जानते हैं कि पृथ्वी एवं सूर्य का इस प्रकार से संकुचित होना असम्भव हैं, क्योंकि न तो पृथ्वी का द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक हैं और न ही सूर्य का।

कृष्ण विवरों के विलक्षण गुणधर्म

किसी कृष्ण विवर का सम्पूर्ण द्रव्यमान एक बिंदु में केन्द्रित रहता हैं जिसे ‘केन्द्रीय विलक्षणता बिंदु’ (Central Singularity Point) कहते हैं। विलक्षणता बिंदु के आसपास वैज्ञानिको ने  एक गोलाकार सीमा की कल्पना की हैं जिसे प्रायः ‘घटना क्षितिज’ (Event Horizon) कहा जाता हैं। घटना क्षितिज से परे प्रकाश सहित समस्त पदार्थ विलक्षणता बिंदु की दिशा में आकर्षित होकर खींचें चले जाते हैं। परन्तु घटना क्षितिज से होकर कोई भी वस्तु बाहर नही आ सकती हैं। घटना क्षितिज की त्रिज्या को ‘स्क्वार्जस्चिल्ड त्रिज्या’ (Schwarzschild Radius) के नाम से जाना जाता हैं, जिसका नामकरण जर्मन वैज्ञानिक और गणितज्ञ कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड  के सम्मान में किया गया हैं। दिलचस्प बात यह हैं कि कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड ने कृष्ण विवरों के विद्यमानता को सैद्धांतिक रूप में सिद्ध करने के पश्चात् इसके भौतिक विद्यमानता को स्वयं अस्वीकृत कर दिया था। कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड और जॉन व्हीलर को कृष्ण विवर के खोज का श्रेय दिया जाता हैं।

आइंस्टाइन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत (Theory of Special Relativity) के अनुसार एक निश्चित दूरी पर स्थित एक प्रेक्षक के लिए कृष्ण विवर के निकट स्थित घड़ियाँ अत्यंत मंद गति से  चलेंगी। विशेष सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार समय सापेक्ष हैं। समय व्यक्तिनिष्ठ हैं, जिस समय प्रेक्षक ‘अब’ कहता हैं, वह केवल स्थानीय निर्देश-प्रणाली पर ही लागू होती हैं, नाकि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर! इस प्रभाव को ‘समय विस्तारण’ (Time Dilation) कहतें हैं। कृष्ण विवर के गुरुत्वाकर्षण के कारण, उससे दूर स्थित कोई भी  प्रेक्षक यह देखेगा कि कृष्ण विवर के अंदर गिरने वाली कोई भी वस्तु उसके घटना क्षितिज के निकट बहुत कम  गति से नीचें गिर रही हैं, उस तक पहुँचनें में अनंत काल-अवधि लगती हुई प्रतीत होती हैं। उस समय उस वस्तु की समस्त गतिविधियाँ  अत्यंत धीमी होने लगेगी, इसलिए वस्तु का प्रकाश  अत्यधिक लाल और धुंधला (अस्पष्ट) प्रतीत होगा। इस प्रभाव को ‘गुरुत्वीय अभिरक्त विस्थापन’ (Gravitational Red Shift) कहते हैं। अंततः कृष्ण विवर के अंदर गिरनेवाली वस्तु इतनी अधिक धुंधली हो जाएगी कि दिखाई देना बंद हो जायेगी। अधिकांशत:  लोगो का यह मत होता हैं कि कृष्ण विवर ‘वैक्यूम क्लीनर’ की तरह व्यवहार करता हैं, परन्तु ऐसा नही हैं। जो भी वस्तु कृष्ण विवर के निकट जायेगा उसे ही वह निगलेगा। इसका अभिप्राय यह हैं कि यदि हमारा सूर्य एक कृष्ण विवर बन जाए, तब इसकी त्रिज्या 3 किमी० होगी, तो भी सभी ग्रहों की कक्षाएँ पूर्णतया अपरिवर्तित होंगी। कृष्ण विवर किसी भी ग्रह को निगल नही सकेगा, बशर्ते यदि वह ग्रह कृष्ण विवर के निकट न आवे।

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स्टीफन हाकिंग

ब्रह्माण्ड में कई प्रकार के कृष्ण विवर हैं जो अपने विशिष्ट भौतिक गुणों द्वारा  पहचाने जाते हैं। ऐसे तारे जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से कुछ गुना अधिक होता हैं और गुरुत्वीय संकुचन के कारण  वे अंततः एक कृष्ण विवर में बदल जाते हैं। ऐसे कृष्ण विवरों को ‘तारकीय  द्रव्यमान कृष्ण विवर’ (Stellar Mass Black Hole) कहते हैं। ऐसे कृष्ण विवर जिनका निर्माण  आकाशगंगाओं के केंद्र में होता हैं, ‘अतिसहंत कृष्ण विवर’ (Super Massive Black Hole) कहलाते हैं। इनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान की तुलना में लाखों-करोड़ों गुना अधिक होता हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी आकाशगंगा-दुग्धमेखला के केंद्र में एक विशाल कृष्ण विवर हैं और इसका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से एक करोड़ गुना हैं। ऐसे कृष्ण विवर जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से भी कम होता हैं, उनका निर्माण गुरुत्वीय संकुचन के कारण न होकर के, बल्क़ि अपनें केंद्रभाग के पदार्थ का दाब एवं ताप के कारण संपीडित होने से होता हैं। ऐसे कृष्ण विवरों को ‘प्राचीन कृष्ण विवर’ (Primordial Black Hole) या ‘लघु कृष्ण विवर’ (Small Black Hole) के नाम से जाना जाता हैं। इन लघु कृष्ण विवरों के बारे में वैज्ञानिकों की मान्यता हैं कि इनका निर्माण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय हुआ होगा। भौतिकविद् स्टीफन हाकिंग के अनुसार हम ऐसे कृष्ण विवरों के अध्ययन से ब्रह्माण्ड की आरंभिक अवस्थाओं के बारे  में बहुत कुछ पता लगा सकतें हैं।

कुछ कृष्ण विवर अपनें अक्ष पर एक नियत गति से घूर्णन भी करतें हैं। सर्वप्रथम वर्ष 1963 में न्यूजीलैंड के एक गणितज्ञ व वैज्ञानिक रॉय केर ने इन घूर्णनशील कृष्ण विवरों (Rotating Black Holes) के अस्तित्व को गणितीय आधार प्रदान किया। इन कृष्ण विवरों का आकार इनकें घूर्णन दर और द्रव्यमान पर निर्भर करता हैं। ऐसे कृष्ण विवरों को अब वैज्ञानिक ‘केर का कृष्ण विवर’ (Kerr’s Black Hole) कहकर संबोधित करतें हैं। इनकी संरचना बहुत जटिलतायुक्त होती हैं, एवं घटना क्षितिज भी गोलाभ (Spheroid) होती हैं। ऐसे कृष्ण विवर जो घूर्णन नही करतें हैं ‘स्क्वार्जस्चिल्ड कृष्ण विवर’ कहलाते हैं।

इन अदृश्य पिंडों को कैसे खोजा जा सकता हैं?

जैसाकि हम जानतें हैं कि कृष्ण विवर प्रकाश की किरणों को उत्सर्जित नहीं करतें हैं, तो  हम इन्हें खोजने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? यह खगोलविदों के लिए एक गम्भीर समस्या थी। परन्तु खगोलविदों ने इस समस्या का भी समाधान ढूढ़ निकाला। मिशेल के अनुसार कृष्ण विवर अदृश्य होने पर भी अपने निकट स्थित पिंडों पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव डालता हैं। खगोलविदों ने इस परियोजना के अंतर्गत आकाश में स्थित उन युग्म तारों का प्रेक्षण किया, जो एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण से बंधकर एक-दूसरे की परिक्रमा करतें हैं। कल्पना करें की आकाश में दो तारें एक दूसरे की परिक्रमा कर रहे हैं, उनमें से एक तारा अदृश्य हैं तथा दूसरा तारा दृष्टिगोचर हैं। ऐसी स्थिति में दृश्य तारा अदृश्य तारे की परिक्रमा करेगा। यदि आप जल्दबाजी में अदृश्य तारे को कृष्ण विवर मान लेते हैं तो आप गलत भी हो सकतें हैं क्योंकि यह एक ऐसा तारा भी हो सकता हैं जो हमसे बहुत दूर हैं और उसका प्रकाश इतना धीमा हैं कि हमे दिखाई न दे रहा हो। यदि खगोलविद दृश्य तारे के कक्षा से सबंधित खगोलीय गणनाओं के आधार पर उसके द्रव्यमान से सबंधित जानकारी एकत्र कर लेगा तो वह खगोलीय विधियों द्वारा सरलता से उस अदृश्य तारे के द्रव्यमान के बारे में पता लगया जा सकता हैं। यदि उसका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना अधिक होता हैं, तो अत्यधिक सम्भावना हैं कि वह अदृश्य तारा एक कृष्ण विवर हैं।

ब्लैक होल की खोज
ब्लैक होल की खोज

कृष्ण विवरों के अस्तित्व को सिद्ध करने का एक अन्य उपाय भी हैं। कल्पना करें कृष्ण विवर के निकट एक दृश्य तारा हैं, तब कृष्ण विवर इस दृश्य तारे की गैसीय द्रव्यराशि को उसके पृष्ठभाग से अपनें में खींचता रहेगा। कृष्ण विवर में दृश्य तारे की द्रव्यराशि के गिरने के कारण उसमें से काफी तेजी से एक्स-किरणें उत्सर्जित होने लगेंगी (घर्षण, ताप एवं दाब के कारण)। तब एक्स-किरणों के उद्गम के निरीक्षण एवं अध्ययन से कृष्ण विवर के भौतिक विद्यमानता को सिद्ध किया जा सकता हैं।

खगोलविदों को वर्ष 1965 में हंस (Cygnus) तारामंडल में एक अत्यंत प्रचंड एक्स-रे स्रोत मिला। उस स्रोत को ‘सिग्नस एक्स-1’ (Cygnus X-l) नाम दिया गया। वर्ष 1970 में अमेरिका द्वारा प्रक्षेपित एक उपग्रह द्वारा यह पता चला कि सिग्नस एक्स-1 कोई श्वेत वामन या न्यूट्रान तारा नही हैं, बल्कि एक कृष्ण विवर हैं। दरअसल सिग्नस एक्स-1 एक युग्म तारक-योजना हैं। इस युग्म तारे का दृश्य तारा अत्यंत विशाल हैं, जो अदृश्य तारे की परिक्रमा कर रहा हैं। खगोलविदों ने सिग्नस एक्स-1 के द्रव्यमान का निर्धारण खगोलीय विधियों द्वारा छह सूर्यों के द्रव्यमान के बराबर की हैं। इससे यह स्पष्ट होता हैं कि सिग्नस एक्स-1 एक कृष्ण विवर हैं।

हाकिंग और कृष्ण विवर

कृष्ण विवरों के सबंध में हमारी वर्तमान समझ भौतिकविद् स्टीफन हाकिंग के कार्यों पर आधारित हैं। हाकिंग ने वर्ष 1974 में ‘कृष्ण विवर इतनें काले नही’ (Black Holes Ain’t So Black) शीर्षक से एक शोधपत्र प्रकाशित करवाया। इस शोधपत्र में हाकिंग ने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत एवं क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों के आधार पर यह दर्शाया  कि कृष्ण विवर पूरे काले नही होते हैं, बल्कि ये अल्प मात्रा में  विकिरणों को उत्सर्जित करतें हैं। हाकिंग ने यह भी प्रदर्शित किया कि कृष्ण विवर से उत्सर्जित होने वाली विकीरणें क्वांटम प्रभावों के कारण शनै: शनै: बाहर निकलती हैं। इस प्रभाव को ‘हाकिंग विकीरण’ (Hawking Radiation) के नाम से जाना जाता हैं। हाकिंग विकीरण प्रभाव के कारण कृष्ण विवर अपने द्रव्यमान को धीरे-धीरे खोने लगते हैं, तथा ऊर्जा का भी क्षय होता हैं (E=mc²)। यह प्रक्रिया लम्बें अंतराल तक चलने के बाद अन्ततोगत्वा कृष्ण विवर वाष्पन को प्राप्त होता हैं। दिलचस्प बात यह हैं कि विशालकाय कृष्ण विवरों से कम मात्रा में विकिरणों का उत्सर्जन होता हैं, जबकि लघु कृष्ण विवर बहुत तेजी से विकिरणों का उत्सर्जन करके वाष्प बन जाते हैं।

बहरहाल, हम कृष्ण विवरों को समझने की यात्रा को यहीं समाप्त करते हैं। निश्चित रूप से हम यह आशा कर सकतें हैं कि वैज्ञानिक भविष्य में कृष्ण विवरों के बारे में और रोचक एवं विचित्र गुणधर्मों को खोजें।

विस्तृत जानकारी के लिए :-

  • Black holes, Worm holes & Time Machines By- Jim Al-Khalili
  • A Brief History of Time By- Stephen Hawking
  • Black Hole, Wikipedia, The Free Encyclopedia

हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन के 25 वर्ष


‘इलेक्ट्रोनिकी आपके लिए ‘ पत्रिका में पूर्व प्रकाशित

सदियों से ब्रह्माण्ड मानव को आकर्षित करता रहा हैं। इसी आकर्षण ने खगोल वैज्ञानिकों को ब्रह्माण्डीय प्रेक्षण और ब्रह्माण्ड अन्वेषण के लिए प्रेरित किया। रात के समय यदि हम आसमान में दिखाई देने वाले तारों का अवलोकन करते हैं, तो हमे दूरबीन के बिना भी कुछ बातें शीघ्र स्पष्ट होने लगती हैं। मगर, हम तारों के सूक्ष्म रहस्यों तथा ब्रह्माण्ड के विभिन्न पिण्डों के आकार, गति, स्थिति, आकृति इत्यादि के बारे में बिना दूरबीन की सहायता से नही जान सकतें हैं। जब महान वैज्ञानिक गैलिलियो ने हैंस लिपर्शे द्वारा दूरबीन के आविष्कार के पश्चात् स्वयं दूरबीन का पुनर्निर्माण किया और पहली बार खगोलीय अवलोकन में उपयोग किया था, उस क्षण के पश्चात् लगभग चार शताब्दियां बीत चुकी हैं। इन चार सौ वर्षों में बहुत से विशालकाय दूरबीनों का निर्माण पृथ्वी पर किया जा चुका हैं तथा कुछ दूरबीने अन्तरिक्ष में स्थापित किए जा चुकें हैं, इन्हीं दूरबीनों में से एक हैं हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन। इसका प्रक्षेपण स्पेस शटल डिस्कवरी द्वारा 25 अप्रैल, 1990 में किया गया। अत: अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था नासा तथा यूरोपीयन अन्तरिक्ष संस्था वर्तमान में हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन के प्रक्षेपण के शानदार 25 वर्ष पूर्ण होने पर रजत जयंती मना रहा हैं।

हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन

विगत 25 अप्रैल, 2015 को हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन ने अपने शानदार पच्चीस वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन खगोलिकी एवं खगोलभौतिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन की महानतम उपलब्धियों ने उसे खगोलभौतिकी एवं खगोलकी के इतिहास ने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दूरबीन बना दिया हैं।

इलेक्ट्रोनिकी आपके लिए, जुलाई 2015
इलेक्ट्रोनिकी आपके लिए, जुलाई 2015

सृष्टी के आरम्भ और आयु के सबंध में खगोलीय प्रेक्षण द्वारा प्रथम परिचय हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन ने ही करवाया हैं। दरअसल हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन हमसे बहुत दूर स्थित अधिनव तारा विस्फोटों (सुपरनोवा) को देखने में समर्थ हैं। इसका प्रमुख उद्देश्य हैं विभिन्न खगोलीय दूरियों का सटीक मापन करके हब्बल स्थिरांक का बिलकुल सटीक आकलन करना। आप सोंच रहे होंगें कि आखिर ये हब्बल स्थिरांक क्या होता हैं? दरअसल एडविन पी० हब्बल ने 1929 में ब्रह्माण्ड के विस्तारित होने के पक्ष में प्रभावी तथा रोचक सिद्धांत रखा। हब्बल ने ही हमें बताया कि ब्रह्माण्ड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखोँ अन्य आकाशगंगाएं भी हैं। उन्होंने अपने प्रेक्षणों तथा डॉप्लर प्रभाव की सहायता से यह निष्कर्ष निकाला कि आकाशगंगाएं ब्रह्माण्ड में स्थिर नही हैं, जैसे-जैसे उनकी दूरी बढ़ती जाती हैं वैसे ही उनके दूर भागने की गति तेज़ होती जाती है। किसी आकाशगंगा के हमसे दूर जाने के मध्य का अनुपात हब्बल स्थिरांक से मिलता हैं। यदि हमे एक सटीक हब्बल स्थिरांक प्राप्त हो जाएगा तो हम ब्रह्माण्ड के वर्तमान, भूत तथा भविष्य को जानने में सक्षम हो जायेंगें।

हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन
हब्बल अंतरिक्ष दूरबीन

हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन की सहायता से खगोलज्ञों ने पृथ्वी से दूर स्थित अत्यंत प्राचीन तारों के समूह को ढूढ निकाला हैं। यह तारा समूह हमसे लगभग 7000 प्रकाशवर्ष हैं। इसके बुझते जाने के रफ्तार के आधार पर वैज्ञानिको ने ब्रह्माण्ड के आयु की हालिया गणना 13 से 14 वर्ष के बीच आंकी हैं। हो सकता हैं कि भविष्य में हब्बल स्थिरांक कुछ और हों, परन्तु ब्रह्माण्ड की जीवनगाथा हब्बल स्थिरांक की कलम से ही लिखी जाने वाली हैं।

इसी दूरबीन ने ही हमे श्याम उर्जा का ज्ञान दिया हैं। इसकी सहायता से खगोलज्ञों ने जब 1 a प्रकार के सुदूरवर्ती अधिनवतारों का प्रेक्षण किया, जो खगोलीय दूरियों को मापने में सहायक होते हैं, तो उन्हें यह ज्ञात हुआ कि हमारा ब्रह्माण्ड न केवल विस्तारमान हैं, बल्क़ि इसके विस्तार की गति भी समय के साथ त्वरित होती जा रही हैं। श्याम उर्जा को इस त्वरण का उत्तरदायी माना जा रहा हैं। ब्रह्माण्ड का कुल 70 प्रतिशत भाग इसी ऊर्जा के रूप में हैं। दीर्घवृत्तीय आकाशगंगाओं की खोज, क्वासरों के विशिष्ट गुणों की खोज तथा वर्ष 1994 में बृहस्पति ग्रह और पुच्छल तारे ‘शूमेकर लेवी-9′ के बीच हुए टकराव का चित्रण हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन की विशिष्ट उपलब्धियों में सम्मिलित हैं। यह पहली अन्तरिक्ष दूरबीन हैं जो अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रा-रेड के समीप कार्य करती हैं और सुग्राहकता के साथ खूबसूरत, मनमोहक एवं अद्भुत् चित्रों को लेती हैं और पृथ्वी पर भेजती हैं।

प्रक्षेपण तथा दुर्लभ खगोलकी प्रेक्षण की शुरुआत

हब्बल दूरबीन एक अन्तरिक्ष आधारित दूरबीन होने के नाते, इसे अन्तरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थापित किया गया हैं। इस दूरबीन को अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था नासा ने यूरोपीयन अन्तरिक्ष संस्था के पारस्परिक सहयोग से तैयार किया था। नासा ने हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए लगभग ढाई अरब डॉलर ख़र्च किए थे। पहले हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन को 1983 में प्रक्षेपित करने की योजना बनाईं गईं थी, परन्तु कुछ तकनीकी खामियों तथा बजट में देरी के कारण इस पारस्परिक सहयोगी कार्यक्रम में सात साल की देरी हो गई। इसे 25 अप्रैल, 1990 को अमेरिकी स्पेस शटल ‘डिस्कवरी’ के उड़ान एस० टी० एस०-31 की सहायता से इसको इसकी कक्षा में स्थापित किया गया। इस अन्तरिक्ष आधारित दूरबीन को खगोलज्ञ ‘एडविन पाँवेल हब्बल’ के सम्मान में हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन का नाम दिया गया। यह दूरबीन अभी 600 किलोमीटर की ऊँचाई पर पृथ्वी के कक्षा के चक्कर काट रही हैं। पृथ्वी की एक चक्कर लगाने में इसे 100 मिनट लगतें हैं।

अंतरिक्ष में
अंतरिक्ष में

इस दूरबीन का निर्माण कार्य 1970 में ही आरम्भ हो चुका था तथा बाल्टिमोर, अमेरिका के स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट में हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन को पूरी तरह से विकसित किया गया। इसके निर्माण से पहलें इसके आकार-प्रकार के बारे में कहीं ज्यादा ही विशाल कल्पना की गईं थी, परन्तु अंततः यह मात्र 13.2 मीटर की लम्बाई और अधिकतम 4.2 मीटर व्यास वाली दूरबीन साबित हुई। पृथ्वी के वायुमंडल से पूर्णतया मुक्त, अन्तरिक्ष में होने के कारण यह पृथ्वी पर उपस्थित विशाल दूरबीनों जैसे- ‘साल्ट’, ‘जी० सी० टी०’, ‘बी० एल० टी०’ इत्यादि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ हैं। इसने खगोलकी से सबंधित कई मौलिक समस्याओं को समझने में खगोलज्ञों की सहायता की हैं। दिलचस्प बात यह हैं कि इसके द्वारा प्राप्त आकड़ों के आधार पर 3000 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए जा चुके हैं। हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन में 2.4 मीटर (94.5 इंच) के दर्पण का उपयोग किया गया हैं। इसका भार 11,110 किलोग्राम हैं। यह प्रतिदिन पृथ्वी पर 12 से 15 गीगाबाइट आंकड़े भेजती हैं, जोकि एक विशाल डाटा हैं।

अन्तरिक्ष में सर्विसिंग

हब्बल दूरबीन प्रथम ऐसी अन्तरिक्ष दूरबीन हैं जिसे अन्तरिक्ष में रिपेयर (सर्विसिंग) किया जा सकता हैं।

अंतरिक्ष में सर्विसिंग
अंतरिक्ष में सर्विसिंग

वर्ष 1990 में इसे प्रक्षेपित करने के पश्चात् वैज्ञानिको ने पाया कि इसके मुख्य दर्पण में कुछ खामी रह गई हैं, जिससे वह पूरी क्षमता के साथ कार्य नही कर पा रही हैं। अत: दिसंबर 1993 को वैज्ञानिकों की एक टीम भेजी गई तथा उन्होंने मुख्य दर्पण को रिपेयेर कर दिया। इसके बाद क्रमशः चार बार इसकी सर्विसिंग की जा चुकी हैं – फरवरी 1997, दिसंबर 1999, फरवरी 2002 और सबसे ताजा रिपेयरिंग मई 2009 में की गई। वर्ष 2009 के सर्विसिंग के अभियान में वैज्ञानिकों ने इसके उष्मा कवच और निर्देशक सेंसर को बदला। इसमें स्पेक्ट्रोग्राफ, इमेजर, बैटरीज और गाइरोस्कोप इत्यादि उपकरण लगाए गए। जब इसको प्रमोचित किया गया था, तब इसकी आयु 10 वर्ष आंकी गईं थी। मतलब 2010 तक इसको कार्य करना चाहिए था, परन्तु इसके नियमित रिपेयरिंग और सर्विसिंग के कारण यह प्रथम ऐसी अन्तरिक्ष दूरबीन बन गई हैं जिसने इतनें लम्बें समय तक कार्य किया हैं तथा 2009 के रिपेयरिंग के बाद आशा हैं कि 2020 तक कार्य करता रहेगा।

वर्ल्ड वाइड टेलिस्कोप (worldwidetelescope.org) नामक वेबसाइट पर जाकर आप सीधे हब्बल अन्तरिक्ष दूरबीन से अन्तरिक्ष का लाइव व्यू देख सकते हैं। आप चाहें तो इसके एप्लीकेशन को अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड भी कर सकतें हैं।

pk110043@gmail.com

Posted by :- Pradeep kumar

कैसा अद्भुत् वण्डर – आकाश में टंगा कलैण्डर


संवत्सर की वैज्ञानिकता

                                                                                                                               -श्री विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी

समय का हिसाब रखना आज के मनुष्य के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। छपे कलैण्डर, हाथ में बंधी घड़ी, मोबाईल फोन, कम्प्यूटर, आदि अनेक साधन समय का हिसाब रखने में मनुष्य की मदद करने को तत्पर हैं। जब इनमें से कोई भी नहीं था तब भी हमारे पूर्वजों ने आम आदमी को समय जानने का अद्भुत उपकरण उपलब्ध करा दिया था। अन्तर केवल इतना था कि प्राचीन काल में विकसित वह उपकरण आदमी के पास व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध नहीं था। वह एक साझा उपाय था जो आकाश में टंगा था। उस सार्वजनिक साधन को दुनियाँ का कोई भी व्यक्ति कहीं से भी देख सकता था। उसी उपकरण को संवत्सर के नाम से जानते हैं। संवत्सर को एक ऐसा कलैण्डर माना जा सकता है जो आज भी आकाश में उसी तरह टंगा है जैसा हजारों वर्ष पूर्व टांगा गया था। वर्तमान में समय जानने के सरल साधन उपलब्ध हो जाने के कारण आम आदमी उसे देखना छोड़ दिया है। आइए, आज हम इसी के बारे में चर्चा करतें हैं।

Zodiac-and-sky
आकाश का कैलेंडर

समय के साथ बदलती ऋतुओं ने ही आदि मानव का ध्यान समय की ओर आकर्षित किया होगा। विश्व के विभिन्न भागों में मानव ने अपने अपने तरिके से समय को मापने के उपाय खोजने प्रारम्भ किए होंगे। भारत में ऐसे प्रयास वैदिककाल तक आते-आते बहुत विकसित हो गए थे। भरत में विकसित कालमापन की पद्धति पर बाहरी प्रभाव को पूर्णतःनकारा तो नहीं जा सकता मगर इतना निश्चित है कि संवत्सर के रूप में कालमापन की भारतीय पद्धति सर्वथा मौलिक खोज है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अनुसार भारतीय ज्योर्तिविद नक्षत्र विद्या में अत्यन्त प्रवीण थे। समय मापन का ज्ञान बेबीलोन या यूनान से भारत नहीं आया था। समय मापन के ज्ञान का विकास वैदिककाल के बाद भी रूका नहीं, बाद में आर्यभट, वराहमिहिर आदि ने भी इसके विकास में योगदान दिया।

क्या है संवत्सर

प्रकृति में एक ऋतुचक्र के पूर्ण होने में लगने वाले कालखण्ड को भारत में संवत्सर नाम दिया गया। मोटे तौर पर देखा जाय तो संवत्सर वह समय है जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है। यहाँ यह जानना उचित ही होगा कि संवत्सर केवल सूर्य पर आश्रित नहीं होकर सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रों तीनों की समन्वित स्थिति पर आधारित है। हमारे पूर्वजों ने संवत्सर का आविष्कार बदलते मौसम की पूर्व सूचना पाने के उद्देश्य से किया होगा।  मौसम की पूर्व सूचना के अभाव में खेतों में सही समय पर बुआई-कटाई आदि कार्य का होना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में पर्याप्त उत्पादन के अभाव में लोगों के भूखे मरने की स्थितियां निरन्तर बनी होती। भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ बने त्यौहार दिपावली, होली, मकर संक्रान्ति, बसन्त पंचमी जैसे ऋतु त्यौहारों की परम्परा भी नहीं बन पाती।

आज आम भारतीय के जीवन में संत्वसर का अर्थ जीवन के कुछ विशिष्ट अवसरों की तिथियां मुहुर्त तथा तीज त्यौहार का दिन जानने तक ही रह गया है। अंग्रेजी वातावरण में विकसित युवा पीढ़ी तो इसे काल मापन की रूढ़ीवादी विधि मानकर हेय दृष्टि से भी देखती है। सच यह है कि संत्वसर अनेकों ऋषियों के हजारों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान का परिणाम है। जिस समय वैज्ञानिक उपकरण के नाम पर मनुष्य के पास कुछ नहीं था तब मात्र अपने नेत्रों से किए गए अवलोकन तथा चिन्तन मनन से आविष्कृत संत्वसर किसी आधुनिक आविष्कार से कम नहीं है।

उत्तरायण-दक्षिणायन

संवत्सर के विकास की नींव उस दिन पड़ी होगी जब हमारे किसी पूर्वज ने ऋतुओं को पहचान कर उनकी अवधि व क्रम जानने का विचार किया होगा। कृषि के विकास के साथ इस क्रम को पहचानने की इच्छा ओर भी बलवती हो गई होगी। इसी इच्छा से प्रारम्भ हुई खोजबीन से वर्षाऋतु से वर्षाऋतु तक के कालखण्ड को एक वर्ष के रूप में निरूपित किया गया होगा। यहाँ यह जान लेना उचित ही होगा कि पृथ्वी पर ऋतुओं होने का राज क्या है? क्या सभी ग्रहों पर ऋतुएं होती है? पृथ्वी पर ऋतुओं का होना उसकी मौलिक विशेषता है। पृथ्वी को सूर्य की कक्षा में रखते समय प्रकृति से एक भूल हो गई। पृथ्वी को उसके परिक्रमण पथ के लम्बवत नहीं रख कर   66 .5 डिग्री पर झुका कर रख दिया गया। वहीं भूल पृथ्वी पर ऋतुओं के बदने का कारण बन गई। शुक्र अपनी कक्षा में लगभग ठीक लम्बवत रखा हुआ है। वहां वर्ष भर एक ही ऋतु रहती है।

पृथ्वी के अपनी कक्षा में झुके हुए होने के कारण वर्ष में केवल दो दिन ही सूर्योदय ठीक पूर्व में होता है। शेष दिन सूर्य उत्तरी या दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है। पृथ्वी से देखने पर सूर्य छः माह उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर तथा छः माह दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर खिसकता नजर आता है। मध्य अवस्था से 23 .5 डिग्री उत्तर (कर्क रेखा) या दक्षिण (मकर रेखा) की ओर जाकर पुनः विपरीत दिशा में लौटने लगता है। संवत्सर में इस घटना को बहुत महत्व दिया गया है। सूर्य के दक्षिण से उत्तर की ओर खिसकने को उत्तरायण तथा उत्तर से दक्षिण की ओर खिसकने को दक्षिणायन कहते हैं। जब सूर्य उत्तरायण में होता है तो दिन लम्बे व रातें छोटी होने लगती है। जबकि दक्षिणायन की स्थिति में दिन छोटा व रात बड़ी होने लगती है।

सूर्य के दक्षिण से उत्तर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर जाते समय केवल दो बार सूर्य अपने पथ के ठीक पूर्व दिशा में उदित होता दिखाई देता है। इसे सम्पात बिन्दु कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करते समय की घटना को बसन्त सम्पात तथा उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवेश को शरद सम्पात कहते हैं। सूर्य के सम्पात बिन्दु पर होने पर दिन व रात प्रत्येक 12 घन्टे होते हैं। दक्षिण की ओर बढ़ता सूर्य 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा को छूकर पुनः उत्तर की ओर लौटने लगता है। इसे ही उत्तरायण कहते हैं। उत्तर की ओर बढ़ता सूर्य 21 जून को कर्क रेखा को छूकर पुनः दक्षिण की ओर लौटने लगता है। इसे दक्षिणायन कहते हैं। 22 सितम्बर को शरद संपात तथा 22 मार्च को बसन्त होता है। बसन्त संपात के बाद की प्रथम तिथि (प्रतिप्रदा) को प्रत्येक संवत्सर व भारतीय नववर्ष का प्रथम दिन कहते है। इसे संपूर्ण देश में उत्साह पूर्वक मनाया जाता है।

क्या हैं नक्षत्र व राशियाँ?

रात्रि आकाश में बहुत से तारे दिखाई देते हैं। चन्द्रमा, सूर्य तथा ग्रह सूर्य के सौर मण्डल में उपस्थित ग्रह एक दूसरे के समीप हैं। जबकि तारे हमसे बहुत दूर हैं। सूर्य व पृथ्वी का समीपतम तारा अल्फा सेन्टोरी की दूरी 4.25 प्रकाश वर्ष है। अन्य तारे हजारों लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं। पृथ्वी से आकाश में एक दूसरे से समीप दिखाई देने वाले तारे भी इसी प्रकार बहुत दूर दूर स्थित हैं। इनमें आपसी कोई सम्बन्ध भी नहीं होता मगर कई-कई तारे मिलकर विशिष्ट आकृतियां बनाते दिखाई देते हैं। तारों से बने विभिन्न आकृतियों के तारामण्डलों का नामकरण अति प्राचीनकाल से ही किया जाता रहा है। पृथ्वी अलग अलग भागों में इन्हें अलग नाम दिए गए। वर्तमान में 78 तारामण्डलों को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। सप्तऋषि मण्डल तथा मृगा मण्डल आकाश के सर्वाधिक परिचित तारामण्डल हैं। तारा मण्डलों के नामकरण से आकाश के किसी भी भाग में स्थित पिण्ड स्थिति को बताना उसी तरह आसान हो गया जैसा हम अपने घर का पता महाद्वीप, देश, प्रदेश, गाँव, शहर, गली, मुहल्लों के नाम के आधार पर बता देते हैं।

निरन्तर प्रेक्षणों से प्राचीनकाल में यह जाना गया कि सूर्य व चन्द्रमा एक वर्ष में आकाश में वृताकार पथ पर एक परिक्रमा पूर्ण कर लेते हैं। इस खोज के बाद मनुष्य ने ऋतुओं व आकाश मार्ग पर सूर्य व चन्द्रमा की स्थिति में सम्बन्ध बैठाने का प्रयास किया होगा। इसी प्रयास के अन्तर्गत भारत के किसी ऋषि ने आकाश में चन्द्र पथ पर बराबर दूरी पर 27 स्थान चिन्हित किए होगें। यह कार्य ठीक वैसा ही था जैसा रेल मार्ग पर स्टेशन बनाने का है। स्टेशन के आधार पर किसी भी समय गाड़ी की स्थिति बता सकते हैं। आकाश में सौर पथ पर स्थित इन 27 चिन्हों को किसी तारे या तारा समूह से पहचान तथा नाम दिए गए। इन्हें ही ऩक्षत्र कहते हैं। नक्षत्रों को किसी वृताकार रेल पथ के 27 स्टेशन माना जा सकता हैं। बेबीलोन वालों ने इस पथ पर 12 स्टेशनों की कल्पना कर 12 तारा मण्डलों से इनकी पहचान दी। जिन्हें हम राशियाँ कहते हैं। पृथ्वी से देखने पर 365 दिन में सूर्यादय इन 12 राशियों या 27 नक्षत्रों की पृष्ठ भूमि में होता दिखाई पड़ता है। सूर्योदय एक माह तक एक राशि में होता दिखाई देता है। यदि नक्षत्र को ध्यान में रख कर बात करें तो सूर्य लगभग 13 दिन एक नक्षत्र क्षेत्र में उदय होता दिखाई देता है। इस विभाजन के कारण आकाश में सूर्य या चन्द्रमा की स्थिति को देख कर ऋतु का अनुमान लगाने की वैज्ञानिक पद्धति विकसित कर ली गई।

बारह राशियों के नाम-

1.मेष 2.वृष 3.मिथुन 4.कर्क 5.सिंह 6.कन्या
    7.तुला 8.वृष्चिक 9.धनु 10.मकर 11.कुम्भ 12.मीन

27 नक्षत्रों के नाम-

1.अश्विनी

 

2.भरणी 3.कृतिका 4.रोहिणी 5.मृगशिर 6.आद्र्रा 7.पुनर्वसु 8.पुष्य 9.आश्लेषा
10.मघा 11.पूर्व फाल्गुनी 12.उत्तरा फाल्गुनी 13.हस्त 14. चित्रा 15.स्वाती 16.विशख 17.अनुराधा 18.जेष्ठा
19.मूल 20.पर्व आषाढ़ 21.उत्तरा आषाढ़ 22.श्र्रवण 23.धनिष्ठा 24.शतभषा 25.पूर्व भाद्रपद 26.उत्तरा भाद्रपद 27.रेवती

 

 

शुक्ल व कृष्ण पक्ष

चन्द्रमा में स्वयं का प्रकाश नहीं है। चन्द्रमा की चमक उसकी सतह पर गिरने वाले सूर्य के प्रकाश के कारण होती है। पृथ्वी से देखने पर सूर्य व चन्द्रमा दोनों ही पृथ्वी की परिक्रमा करते प्रतीत होते हैं। चन्द्रमा सूर्य से कुछ तेज चलता है इस कारण अमावस्या को दोनों साथ होते हैं तो पूर्णिमा को 180 डिग्री के कोण पर। अमावस्या को चन्द्रमा का चमकता भाग पृथ्वी से विरीत दिशा में होता है इस कारण चन्द्रमा पृथ्वी पर दिखाई नहीं देता। जबकि पूर्णिमा पर चन्द्रमा का सम्पूर्ण चमकता भाग पृथ्वी की ओर होता है इस कारण पूर्ण चन्द्र दिखाई देता है। पूर्णिमा से सूर्य व चन्द्रमा की कोणीय स्थिति में परिवर्तन होता है इस कारण चन्द्रमा के चमकता क्षेत्र क्रमश: कम होता जात है और अमावस्या पर चन्द्रमा लुप्त होजाता है। पूर्णीमा के बाद से अमावस्या के 15 दिन की अवधि को कृष्णपक्ष कहा जाता है। अमावस्या के बाद से चन्द्रमा को चमकीला भाग फिर दिखने लगता है और निरन्तर बढ़ता जाता है और पूर्णिमा पर पूर्ण चन्द्र दिखाई देता है। इस अवधि को शुक्ल पक्ष कहते हैं। इस तरह पक्ष एक वैज्ञानिक ईकाई है तथा दो पक्षों के मिलने से माह भी एक वैज्ञानिक ईकाई है।

भारतीय महीनों के नामकरण की पद्धति भी पूर्णतः वैज्ञानिक है तथा विश्व में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। महिनों के नाम आकाश में लिख दिए गए हैं। पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता हैं उस नक्षत्र के नाम पर महीने का नामकरण किया गया है। जिस पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा नक्षत्र में होता है उस माह का नाम मघा तथा श्रवण नक्षत्र में होने पर श्रवण कहा जाता है।

भारतीय महिनों के नाम-

1.चेत्र 2.वैशाक 3.जेष्ठ 4.आषाढ़ 5.श्रावण 6.भाद्रपद

 

7.आश्विन 8.कार्तिक 9.मार्गशीर्ष 10.पौष 11.मघा 12. फाल्गुन

 

टूटती तिथि की वैज्ञानिकता

संवत्सर में प्रतिदिन की तिथि देखने हेतु चन्द्रमा का उपयोग किया गया। भारतीय पंचाग में तिथि एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक चलती है। जिस दिन चन्द्रमा सूर्य के साथ उदय होकर सूर्य के साथ ही अस्त होता है उसे अमावस्या कहते है। जिस दिन चन्द्रमा सूर्यास्त के बाद उदय होता है उसे पूर्णिमा नाम दिया गया। आकाश में चन्द्रमा का पथ वृताकार होने के कारण 360 अंश का होता है। एक माह में 30 दिन होने के कारण इसे 30 बराबर भाग में बांटने से प्राप्त एक भाग 12 अंश को होता है। चन्द्रमा के अपने पथ पर 12 अंश चलने को एक तिथि माना गया है। यह वैज्ञानिक विभाजन है। चन्द्रमा आकाश में सदैव एक समान चाल से नहीं चलता। कभी 19 घन्टे में 12 अंश चलता है तो कभी इसी दूरी को तय करने में 26 घन्टे ले लेता है। इस कारण तिथि परिवर्तन प्रति दिन सूर्यादय के समय नहीं होकर दिन में किसी भी समय हो हो सकता है। इस कारण एक ही दिन में दो तिथियाँ भी हो जाती है।

एक ही दिन में दो तिथियों का होना व्यवहार की दृष्टि से उचित नहीं जान पड़ा तो यह तय किया गया जो तिथि होगी उसे ही पूरे दिन की तिथि माना जाएगा। इस नियम के कारण जब कोई तिथि 24 घन्टे से लम्बी होती है तो एक ही तिथि में दो सूर्योदय हो जाते है और दो दिन एक ही तिथि रहती है। इसके विपरीत कोई दूसरी तिथि सूर्योंदय के बाद प्रारम्भ हुई तथा छोटी होने के कारण अगले सूर्याेदय से पूर्व समाप्त हो जाती है। इस कारण इसकी गिनती नहीं हो पाती । इसे ही तिथि का क्षय होना या तिथि टूटना कहते है। यह स्थिति असुविधाजनक भले ही हो मगर है वैज्ञानिक। आकाश में चन्द्रमा की स्थिति तथा चन्द्रमा की कला देखकर बिना कलेण्डर व घड़ी के समय व तिथि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

वार: नहीं है प्राकृतिक आधार

तिथि के साथ वार गिनने का प्रचलन विश्व के सभी कलेण्डरों में है। रविवार से शनिवार तक सात दिन होते है। वार का किसी प्राकृतिक पिण्ड से सीधे सीधे कोई संबन्ध नहीं मिलता। प्राचीन भारत में वार नहीं थे। इनका समावेश बाद में बाहरी प्रभाव के रूप में हुआ। इसका प्रमाण अमावस्या के मासिक अवकाश के रूप में आज भी देखा जा सकता है। रविवार के साप्ताहिक अवकाश की परम्परा भी इसके साथ ही आई।

अधिक मास व क्षय मास

चन्द्रवर्ष ( 354 दिन ) तथा सौरवर्ष ( 364 दिन ) में प्रतिवर्ष पड़ने वाले 10 दिन के अन्तर को प्रति तीसरे वर्ष एक अधिक मास बना कर दूर दिया गया। इस कारण संवत्सर का ऋतुओं के साथ सम्बन्ध  बना रहता है। भारतीय चन्द्रमास का नियम यह है कि जिस माह जो संक्रान्ति (सूर्य का एक राशि सीमा से निकल कर दूसरी राशी सीमा में प्रवेश करना)  हो उसी नाम पर माह का नाम होता है। इस कारण जिस माह में कोई संक्रान्ति नहीं हो उस माह का कोई नाम नही होता तथा वह पूर्व वाली संक्रान्ति के नाम पर ही जाना जाता है। अर्थात निरन्तर दो माह का एक ही नाम होता है। इसे ही अधिक मास कहते है। इसके अगले एक माह में दो संक्रान्तियां हो जाती है। एक माह के दो नाम तो हो नहीं सकते अतः एक माह के नाम को छोड़ना पड़ता है। इसे ही क्षय माह कहते हैं। इसमें भी पूर्ण वैज्ञानिक दिखाई देती है।

नक्षत्रों का तड़का

संवत्सर केवल सौरचन्द्र वर्ष ही नहीं है। इसे रूचिकर व प्रमाणिक बनाने के लिए ज्योतिषयों ने इसमें नक्षत्रो का समावेश भी कर दिया है। कार्तिक अमावस्या पर स्वाती नक्षत्र में ही दिपावली पूजन किया जाता है तो होलिका दहन फाल्गुन नक्षत्र में किया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र में तो रामनवमी आद्रा नक्षत्र में मनाई जाती है। एक ही त्यौहार का एक ही देश में भिन्न भिन्न मनाया जाना असुविधाजनक भले ही हो मगर अवैज्ञानिक नहीं है। भारत जैसे विशाल देश में सभी स्थानों पर सूर्योदय का समय समान नहीं होता अतः एक ही दिन देश के दो भागों में दो भिन्न तिथियाँ होने से तिथि के अनुसार मानाए जाना वाले त्यौहार अलग अलग दिन हो सकते हैं।

क्या है अयनांश

आकाश में पृथ्वी की कितनी गतियाँ है ? इस अनुमान लगाना आज भी असंभव सा है। अभी तक जिस कलैण्डर की चर्चा हमने की वह पृथ्वी की दैनिक गति व वार्षिक गति के कारण है। पृथ्वी की एक गति और है जिसका समावेश नहीं करने पर उपरोक्त कलैण्डर का ऋतुओं के साथ सम्बन्ध बिगड़ जाता है। वैदिककाल में बसन्त संपात अग्रहायन (अग्राहायन, हायन का अर्थ वर्ष से है) माह में होता था इसी कारण वैदिककाल में संवत्सर का प्रथम माह अग्रहायन या मार्गषीर्ष माना गया। गीता में कहा गया है मासानाम मार्गशीर्षोऽम। यह ईसापूर्व 4000 वर्ष के लगभग की घटना होगी।  वर्तमान में बसन्त संपात चैत्र में होता है इस कारण चैत्र को संवत्सर को प्रथम माह माना जाता है। शुक्लपक्ष को शुभ मानने के कारण शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष का प्रथम दिन माना जाता है। अयनांश में परिवर्तन पृथ्वी की अक्ष के पीछे खिसकने के कारण होता है। पृथ्वी की काल्पनिक अक्ष  23 .5 डिग्री झुकी होने के साथ साथ वृताकार पथ पर पीछे भी खिसकती रहती है।

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न कलेण्डर को अपनाया जाना किसी को अवैज्ञानिक लग सकता है मगर देखा जावे तो यह हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिकता को ही प्रमाणित करता है। अन्य देशों में पृथ्वी की वार्षिक गति को ध्यान में रख कर ही कलेण्डर बनाए गए मगर भारतियों ने पृथ्वी की अक्ष के घूर्णन को ध्यान को ध्यान में रख कर उससे तारतम्य बैठाने के प्रयास किए। इस प्रयास में ही अलग कलैण्डर बनते गए मगर मूलभूत रूप से सभी में साम्य दिखाई देता हैं।

पृथ्वी की जलवायु सूर्य पर निर्भर करती है। पृथ्वी की विशिष्ट स्थिति एवं सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा पर ही ऋतुएं होती है। यह भी बहुत संम्भव है कि पृथ्वी की अक्ष के घर्णन का प्रभाव भी उसके दीर्घकालीन जलवायु जैसे हिमयुग या गर्मकाल के रूप में सामने आता होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की धुरी लगभग 25800 वर्ष में एक वृत पूरा कर लेती है। इस कारण बसन्त सम्पात प्रतिवर्ष लगभग 20 मिनिट 24.58 सैकण्ड पहले होजाता है। वैदिककाल में अगहायन माह में होने वाला बसंन्त सम्पात अब चैत्र में होने लगा है तथा भविष्य ओर पीछे खिसक जाएगा। पृथ्वी की धुरि के खिसकने का असर ध्रुव तारे पर भी पड़ता है। घ्रुवतारा किसी एक तारे का नाम नहीं है। जो तारा पृथ्वी की अक्ष की सीध में होता है वही उत्तरी आकाश में स्थिर दिखाई देता है। पृथ्वी की अक्ष के खिसकने के साथ ध्रुव की स्थिति वाला तारा भी बदलता रहता है। अभी पोलेरिश तारा ध्रुव स्थिति में है मगर 5000 वर्ष पूर्व अल्फा डेकानिस ध्रुव तारे की भूमिका में था। 5500 वर्ष बाद अल्फा सेफी तारा ध्रुव की स्थिति में होगा।

लेखक परिचय:

श्री विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हिन्दी के चर्चित विज्ञान लेखक हैं।

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदीजी
विष्णु प्रसाद चतुर्वेदीजी

माध्यमिक कक्षाओं में 25 वर्षों तक विज्ञान अध्यापन के बाद आप श्री बांगण राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। आपके विज्ञान विषयक आलेख वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त होते रहे हैं। सामाजिक तथा वैज्ञानिक विषयों पर आपकी लगभग 350 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।  साथ ही आपकी विज्ञान विषयक 10 पुस्तकें भी प्रकाशि‍त हो चुकी हैं, जिनमें एक बाल विज्ञान कथा संग्रह भी शामिल है। इसके अतिरिक्त कई पत्रिकाओं के सम्पादन में संलग्न। इसके अतिरिक्त विज्ञान लेखन के लिए आपको राजस्थान साहित्य अकादमी, शिक्षा विभाग राजस्थान सहित अनेक संस्थाएं पुरस्कृत/सम्मानित भी कर चुकी हैं।

सम्पर्क:- 2 तिलक नगर पाली ( राजस्थान) 306401; vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

प्रस्तुतकर्ता प्रदीप कुमार

 

सूर्य : एक आदर्श तारा-3


आदर्श तारे सूर्य को जानने के क्रम में हमनें इस लेख श्रृंखला के प्रथम भाग में जाना कि सूर्य हमसे कितना दूर हैं, यह हमारी पृथ्वी से कितना बड़ा हैं, सौर कलंक क्या होते हैं, यह हमारी आकाशगंगा का एक आदर्श तारा कैसे हैं, इसकी तेजस्विता का रहस्य क्या हैं, हाइड्रोजन बम और सौर ऊर्जा का क्या सबंध हैं। हमने दूसरे भाग में सूर्य की संरचना, सूर्य ग्रहण से समन्धित प्रचलित अन्धविश्वासों एवं मिथकों और राशि पथ के बारे में जाना। यह इस श्रृंखला का अंतिम लेख हैं। इस भाग में हम यह चर्चा करेंगें कि मानव और सूर्य का क्या सबंध हैं? कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि का सूर्य से क्या सबंध हैं? एवं सूर्य का जन्म और अंत कैसे होगा?

by- Pradeep kumar

सूर्य और हम

सूर्य से ही पृथ्वी पर जीवन हैं शायद मानव इस तथ्य से प्रचीन काल से ही अवगत रहा है। सभी ज्ञात प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य की पूजा-उपासना से सबंधित प्रमाण मिलते हैं। मसलन दिलचस्प बात यह हैं कि भारतीय राजा, सम्राट इत्यादि स्वयं को सूर्यवंशी कहते थे। बात यह हैं प्राचीन काल के लोग सूर्य के महत्व को समझते थे; परन्तु वे यह नही जानते थे कि ये आखिर हैं क्या! अत: लोगों ने सूर्य को देवता का दर्जा दिया और पूजने लगे।

सूर्य और पृथ्वी
सूर्य और पृथ्वी

यहाँ तक हमारे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में जितने भी देवताओं का वर्णन हैं उनमे से अधिकतर देवताओं के नाम सूर्य से सम्बन्धित हैं। ऋग्वेद में एक शब्द ‘द्वादशादित्य’ का वर्णन मिलता हैं, जिसका मतलब हैं ‘बारह सूर्य‘। हर महीनें सूर्य सूर्योदय का स्थान बदलता रहता हैं, इसलिए बारह सूर्यों की कल्पना की गई थी। ऋग्वेद में एक अन्य जगह कहा गया हैं कि सूर्य एक ही हैं।*(साभार: गुणाकर मुले)
प्राचीन भारत में सूर्य को ‘सविता’ और ‘पुष्ण’ के नाम से पूजा जाता था। मिस्र में रा, ईरान में मित्रा (भारत का ‘मित्र’ अर्थात्, सूर्य), ग्रीस में ‘असुरिया’, ‘हिलियोस’ अथवा ‘अपोलो’ तथा इटली में ‘जुपिटर सोल’ कहते थे। क्या आप जानते हैं कि जापान को उगते सूर्य का देश क्यों कहाँ जाता हैं? दरअसल जापान को ‘निप्पान’ के नाम से भी जाना जाता हैं, जिसका अर्थ हैं ‘उगते सूर्य का देश’

सूर्य के सम्बन्ध में वर्तमान में जो जानकारी हमारें पास हैं, प्राचीन काल के लोगों के पास नही थी। प्राचीन काल के लोग चन्द्रमा को सूर्य से बड़ा मानते थे, जोकि गलत हैं। आज हम सूर्य और पृथ्वी के दूरी का सटीक आकलन कर सकते हैं, हम बता सकते हैं कि सूर्य हमारी पृथ्वी से कितना बड़ा हैं, सूर्य क्यों चमकता हैं, सूर्य ग्रहण का वैज्ञानिक कारण क्या हैं।

जैसाकि हम जानते हैं कि सूर्य द्वारा प्राप्त किरणों से ही पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों का प्रादुर्भाव हुआ। सूर्य के विशिष्ट ताप की ही बदौलत आज जल ‘द्रव अवस्था’ में पृथ्वी पर उपस्थित हैं और जल ही कारण ही आज से अरबों साल पहले पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई। सभी ईंधनों जैसे कोयला, लकड़ी, तेल, गैसों इत्यादी से प्राप्त होने वाली ऊर्जा का सम्बन्ध सौर उर्जा से ही हैं। आप पूछेंगे वह कैसे? दरअसल पौधों के पत्तियों के अंदर पाया जाने वाला एक विशिष्ट पदार्थ, जिसके कारण पत्तियों का रंग हरा होता हैं, ‘क्लोरोफिल’ होता हैं जो सूर्य के ऊर्जा को ग्रहण करता हैं और वायुमंडल से ग्रहण की गई कार्बनडाईऑक्साइड को लकड़ी में परिवर्तित कर देता हैं। इसी लकड़ी से एक पेड़ बनता हैं। प्राचीन काल में आए एक आपदा के कारण पेड़-पौधे पृथ्वी की सतह के नीचें दब गए और बषों तक दबा रहा। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति, दाब और ताप, एवं जीवाणुओं के मिलजुले प्रभाव से पेड़-पौंधे के दबे हुए अवशेष ‘कोयले’ में परिवर्तित हो गए।
निष्कर्ष में हम यह कह सकतें हैं कि ‘परमाणु-ऊर्जा’ के अतिरिक्त पृथ्वी पर उपस्थित समस्त ऊर्जा सूर्य से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सबंध रखती हैं।

सूर्य का जन्म और अंत

हम जानते हैं कि सूर्य तथा अन्य तारों के अंदर हाइड्रोजन तथा हीलियम सर्वाधिक मात्रा में पाये जाने वाले तत्व हैं। यदि कोई भी व्यक्ति यह बोलता हैं कि हमारा सूर्य हाइड्रोजन तथा हीलियम से बना हैं, तो वह 98 % सही बोल रहा हैं। अन्य कुल तत्वों का योगदान 1% से भी कम हैं। क्या आप जानते हैं, सूर्य के अंदर हीलियम हैं, इसका पता सबसे पहले भारत के आंध्रप्रदेश राज्य में खग्रास सूर्य ग्रहण के दौरान चला। रोचक तथ्य यह हैं, कि यह पता पहले चला कि सूर्य पर हीलियम गैस की उपस्थिति हैं, परन्तु पृथ्वी पर इसकी खोज बाद में की गई।

जैसाकि हम जानते हैं कि हमारा सूर्य भी एक तारा हैं, इसलिए इसका भी विकासक्रम तारों जैसा होना चाहिए। दरअसल एक तारे की जीवन यात्रा आकाशगंगा में उपस्थित धूल एवं गैसों के एक अत्यंत विशाल मेघ (बादल) से शुरू होती है। इसे ‘नीहारिका’ (नेबुला) कहते हैं । दरअसल नीहारिका शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द नीहार से हुई जिसका अर्थ है ‘कुहरा’ । लैटिन में नीहारिका शब्द को ‘नेबुला’ कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘बादल’। इन नीहारिकाओं के अंदर हाइड्रोजन की मात्रा सर्वाधिक होती है और 23 से 28 प्रतिशत हीलियम तथा बहुत कम मात्रा में कुछ भारी तत्व होते हैं।

वर्तमान में सभी वैज्ञानिक इस सिद्धांत से सहमत हैं कि धूल और गैसों के बादलोँ से ही सूर्य का जन्म हुआ हैं। कल्पना कीजिए कि गैस और धूलों से भरा हुए मेघ के घनत्व में वृद्धि हो जाती है। उस समय मेघ अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगता है। इसके सिकुड़ने के समय को ताराभौतिकी में ‘हायाशी-काल’ कहा जाता है। जैसे -जैसे मेघ सिकुड़ने लगता है, वैसे-वैसे उसके केन्द्रभाग का तापमान तथा दाब भी बढ़ जाता है। आखिर में तापमान और दाब इतना अधिक हो जाता है कि हाइड्रोजन के नाभिक आपस में टकराने लगते हैं और हीलियम के नाभिक का निर्माण करते हैं । तब तापनाभिकीय अभिक्रिया (संलयन) प्रारम्भ हो जाता है। इस प्रक्रम में प्रकाश तथा गर्मी के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह मेघ ताप और प्रकाश से चमकता हुआ हमारा सूर्य बन जाता है।

यदि सूर्य का जन्म हुआ था, तो क्या इसका अंत भी होगा? प्राचीन काल के लोग यह सोचते थे कि हमारा ब्रह्माण्ड आदि-अनंत हैं, परन्तु अब हम जानते हैं कि ऐसा नही हैं। जिसका निर्माण हुआ हैं, उसको मिटना होगा। प्राचीन काल के ज्योतिषियों ने सूर्य की स्थिति में कोई भी परिवर्तन न देखते हुए इसको अनादि-अनंत माना।

यहाँ तक नक्षत्र शब्द का भी यही अभिप्राय हैं- ‘जिसका क्षत न होता हों’ – ‘नक्षत्र’। अब हम जानते हैं कि सूर्य के हाइड्रोजन का भंडार धीरे-धीरे कम होता जा रहा हैं, और हीलियम का निर्माण जारी हैं। जब हाइड्रोजन का भंडार समाप्त हो जायेगा, तब सूर्य के अंदर चल रही संलयन अभिक्रिया रुक जाएगी। उस समय सूर्य वर्तमान की तरह उर्जा की आपूर्ति नही कर सकेगा। हाइड्रोजन भंडार समाप्त होना उसकी मृत्यु की सूचक होगी। इससे सूर्य फैलने लगेगा और वर्तमान स्थिति से लगभग 200 गुना अधिक बड़ा हो जाएगा। फैलने के पश्चात् सूर्य एक ‘महादानव तारा’ बन जायेगा। तब इसके परिधि में जो कुछ आएगा, वह उसको निगल लेगा। यह स्थिति आज से करीब पांच अरब साल बाद आएगी।

विस्तार के बाद अंततः सूर्य सिकुड़ने लगेगा। और उसमे मौजूद हीलियम भारी तत्वों में परिवर्तित होने लगेगा। आखिर में यह इतनी तेज़ी से सिकुड़ेगा कि इसका आकार हमारी पृथ्वी के बराबर हो जाएगा। खगोलज्ञ तारों की ऐसी अवस्था को ‘श्वेत वामन तारे’ कहते हैं। यदि पृथ्वी महादानव तारे से बच भी जाता हैं तो जब सूर्य श्वेत वामन तारा बन जायेगा। श्वेत वामन तारे के कारण पृथ्वी पर पर एक्स-रे तथा अन्य पैराबैंगनी किरणों की झड़ी-सी लग जाएगी । उस समय पृथ्वी को जीवन विहीन बनने से कोई भी नही रोक पायेगा। जब समय बीतने के साथ श्वेत वामन तारा अंततः एक ‘श्याम वामन तारा’ बन जायेगा। और सूर्य का अंत हो जायेगा।

यह इस लेख का अंतिम भाग था। लेख के दोनों भागों में पाठकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। लेखक स्वयं एक जिज्ञासु हैं, जो सूर्य के रहस्यों को समझना चाहता हैं और जिज्ञासावश लेखक को जो भी जानकारी मिली, उसे इस ब्लॉग के माध्यम से पाठकों से साझा किया हैं। धन्यवाद्!

सूर्य : एक आदर्श तारा-2


by:- Pradeep kumar

पिछले लेख में आपनें यह जाना कि सूर्य हमसे कितना दूर हैं, यह पृथ्वी से कितना बड़ा हैं, सौर-कलंक क्या होते हैं, हमारा सूर्य आकाशगंगा का एक आदर्श सितारा कैसे हैं, सूर्य की तेजस्विता का रहस्य क्या हैं इत्यादि ।  इस भाग में आप सूर्य की संरचना, सूर्य ग्रहण से समन्धित मिथकों, राशि-पथ और संक्रान्ति के बारे में जानेंगे:-

सूर्य की आन्तरिक संरचना

हम जानते हैं कि सूर्य तथा अन्य सभी तारे विशाल गैसीय पिंड हैं, इसलिए वे हमारी पृथ्वी की तरह ठोस नही हैं। हम अपनी नंगी आँखों से सूर्य की जिस सतह को देखतें हैं, जिसमें से हमें सूर्य का सम्पूर्ण प्रकाश आता हुआ प्रतीत होता हैं, प्रकाशमण्डल’ (Photospere) अथवा ‘प्रकाशावरण’ कहलाता हैं। फोटोस्फेयर का अर्थ हैं प्रकाश का आवरण। जब सूर्य के केन्द्रभाग से उर्जा निर्मुक्त होती हैं, तब उस ऊर्जा का, प्रकाशमण्डल तक पहुंचते-पहुंचते प्रकाशीय-किरणों में परिवर्तन हो जाता हैं, इसलिए हम इस प्रकाशमण्डल को अपनी आँखों से देख सकते हैं। प्रकाशमण्डल की मोटाई लगभग 500 किलोमीटर हैं और सूर्य के केन्द्रभाग से लगभग 7 लाख किलोमीटर दूर हैं। हमारे वैज्ञानिकों का सम्पूर्ण अवलोकन केवल सूर्य के प्रकाशमण्डल तक ही सीमित हैं, क्योंकि इसके नीचें की सतहें हमे अपारदर्शी प्रतीत होती हैं। अवलोकन करने पर हमे सूर्य के प्रकाशमण्डल में सफेद-सफेद चमकीले धब्बे दिखाई देते हैं, वे फैकुली (Faculie) कहलाते हैं। वैज्ञानिको के अनुसार फैकुली का तापमान सूर्य की सतह के औसत तापमान से कहीं अधिक होता हैं तथा ये बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा निर्मुक्त कर रहे हैं।

सूर्य की संरचना को स्पष्ट करने के लिए हम यह कल्पना कर सकते हैं कि इसमें एक के बाद एक गोलाकार परतें हैं, ठीक प्याज के छिलकों की तरह। प्रकाशमण्डल के ठीक बाहर (उपर) उसकी वायुमंडलीय परत वर्णमण्डल (Chromosphere) होता हैं। इसका अवलोकन हम केवल ‘खग्रास सूर्य ग्रहण’ या ‘पूर्ण सूर्य ग्रहण’ (Total Solar Eclipse) के समय ही कर सकते हैं। इसका कारण यह हैं कि की 

Sun-structure
सूर्य की संरचना

प्रकाशमण्डल के तेजस्विता के कारण वर्णमण्डल से निर्मुक्त प्रकाशीय किरणें हमे काली दिखाई देतीं हैं। खग्रास सूर्य  ग्रहण के विशिष्ट अवसर पर जब चन्द्रमा सूर्य के  प्रकाशमण्डल को ढक लेता हैं,  तब हम सूर्य के इस वर्णमण्डल  को आसानी से देख सकतें हैं। यदि पूर्ण ग्रहण हैं तो हम वर्णमण्डल को नंगी आँखों से भी देख सकते हैं। यह वर्णमण्डल प्रकाशमण्डल के ठीक उपर औसतन 10 हजार किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ हैं। इस वर्णमण्डल के अंदर ऊँची-ऊँची ज्वालाएं उठती हैं, जिसे सौर ज्वालाएं (Solar Flares) कहतें हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन ज्वालाओं के उठने का कारण सूर्य की विद्युतचुम्बकीय धाराएँ हैं। बहुत ही अधिक संख्या में प्रकट होने वाली ये ज्वालाएं चाप के आकार की होती हैं। परन्तु विस्मयकारी तथ्य यह हैं कि इनके द्रव्य का तापमान बहुत कम होने के कारण, ये पृथ्वी से देखने पर काले धब्बों (Blackspots) की तरह दिखाई देती हैं।

flares
सौर ज्वालाएं 

जब हम खग्रास सूर्य ग्रहण का अवलोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि सूर्य ग्रहण के कुछ ही समय बाद (एक या दो मिनट) वर्णमण्डल का दिखाई देना बंद हो जाता हैं और ध्यान से देखने पर हमे सूर्य के चारो तरफ एक सफेद आवरण दिखाई देता हैं, जिसे ‘परीमण्डल’ अथवा ‘किरीटावरण’ (Corona) कहते हैं। महान खगोलशास्त्री और हैली धूमकेतु को खोजने वाले, एडमण्ड हैली ने परीमण्डल को मोती के समान श्वेत कहकर वर्णित किया (साभार:- डॉ० के० डी० पुरोहित एवं हेमचन्द्र)। सूर्य का परीमण्डल बहुत दूर तक फैला हुआ हैं। इसका तापमान लाखों डिग्री होता हैं। सबसे अधिक विस्मयकारी बात इस परीमण्डल के अंदर यह हैं कि इसके तापमान में बहुत ही अधिक वृद्धि होती हैं। नही समझे? दरअसल प्रकाशमण्डल से वर्णमण्डलतक जाने में तापमान तीन से चार गुना बढ़ जाता हैं, परन्तु परीमण्डल तक तापमान में अकस्मात ही वृद्धि हो जाती हैं। तापमान में यह वृद्धि ‘थर्मोडाईनॅमिक्स’ (उष्मागतिकी) के सामान्य नियमों के अनुकूल नही प्रतीत होता। ताप-वृद्धि विषय अत्यधिक गहन होने के कारण इसके बारे में हम बाद में विस्तार से चर्चा करेंगें। आइए,अब हम सूर्य ग्रहण के बारे में चर्चा करतें हैं।

सूर्य ग्रहण : अंधविश्वास और वास्तविकता

हमारे देश में वैदिक काल से ही सूर्य ग्रहण से सम्बन्धित कथाएं और किवदंतियाँ प्रचलन में रही हैं। वर्तमान में भी लोग इन पौराणिक कथाओं को सत्य मानते हैं। ग्रहण के एक-दो दिन पहले से ही टीवी और समाचार पत्रों के माध्यम से फलित ज्योतिषी अपना कूपमंडूक सुनाते रहते हैं। असल में ग्रहण के समय पुरोहित, ज्योतिषी, पंडे आदि दान-दक्षिणा इत्यादि के बहाने लोगों के मन में भय उत्पन्न करने की मंशा रखते हैं और उनका अपने तरीके से उपयोग तो करते ही हैं। एक कथा, जिसे अक्सर सूर्य-ग्रहण के समय ज्योतिषी सुनाते रहतें हैं, वह कुछ इस प्रकार से हैं-

विप्रचित्त नामक एक पण्डित थे। उनकी पत्नी ने सिंहिका ने राहु नामक एक पुत्र को जन्म दिया। राहु बचपन से ही झगडालू स्वभाव का था।

सूर्य ग्रहण के लिए किस प्रकार से राहु दोषी हैं, इसका पहली बार वर्णन विष्णु पुराण में मिलता हैं। उसमे देवताओं और असुरों के बीच के युद्ध के बारे बताया गया हैं। युद्ध में देवताओं और असुरों में इस बात पर संधि हो जाती हैं कि समुद्र-मंथन में निकली हुई वस्तुओं को दोनों में बराबर-बराबर बाँट दिया जायेगा। मंथन हुआ, तो उसमे से विष, चन्द्रमा, वारुणी, कल्पवृक्ष, कामधेनु, चन्द्रमा, लक्ष्मी के अतिरिक्त औषधि-विज्ञान के जनक धन्वंतरि भी अमृत का कलश लिए हुए निकले। अमृत के निकलते ही असुर अमृत को लेकर भाग गए। विष्णु नामक एक चालाक देवता ने अमृत को असुरों के चंगुल से निकालकर वापिस लाने के लिए मोहिनी नामक सुन्दरी का रूप धारण किया। असुर मोहिनी के सुन्दरता से मोहित हो गए। मोहिनी ने अपने हाथों से असुरों को अमृत पिलानें की बात की, तो असुरों ने उसका यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मोहिनी ने अमृत को ले जाकर देवताओं में बाँटना शुरू कर दिया। राहु ने अपनी वेशभूषा को परिवर्तित कर लिया और देवता बनकर देवताओं के मध्य जा बैठा। अमृत परोसा गया, परन्तु जैसे ही राहु ने अमृत के कलश को मुँह से लगाया, वैसे ही सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया। दोनों ने यह बात विष्णु को बताया। विष्णु ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से राहु के सिर को काटकर अलग कर दिया। परन्तु अमृत राहु के कंठ तक पहुँच चुका था, इसलिए उसका सिर अमर हो गया था। उसे सूर्य और चन्द्रमा पर बहुत क्रोध आया और तबसे ही उन्हें ग्रसने लगा।

यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना अच्छा होगा कि हमारे चारो वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा सामवेद में कही पर भी राहु का उल्लेख नही हुआ हैं। अथर्ववेद में केतु शब्द का जो उल्लेख मिलता हैं, वह आज के धूमकेतु के लिए प्रयोग हुआ प्रतीत होता हैं।
ग्रहणों के बारे में जो आज अन्धविश्वास हैं, उसका वर्णन महाभारत, मनुस्मृति, अथर्ववेद के साथ-साथ अन्य पोथियों में भी हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं-
1)- सूर्य ग्रहण के समय भोजन को पकाना तथा खाना नही चाहिए।
2)- घर के अंदर उपलब्ध समस्त सामग्री पर तुलसी के पत्ते की सहायता से पानी का छिडकाव करना चाहिए।
3)- ग्रहण के समाप्त होने के बाद स्नान करना चाहिए।
4)- ग्रहण के समय रूपयें, कपड़े, मवेशियों इत्यादि को पुरोहितों, पंडितों, पंडो को दान करना चाहिए। इत्यादि अंधविश्वास और भ्रांतियों का समावेश हैं, जिसका यहाँ पर वर्णन करने से लेखक और पाठक के समय को अन्यथा लेने के तुलनीय होगा। निस्संदेह यह कथा मनगढंत हैं तथा ये कठोर नियम हमारे किसी काम के नही हैं, और इनको अब बढ़ावा नही मिलना चाहियें।

ऐसा भी नही हैं कि प्राचीन काल में किसी भी ज्योतिषी को सूर्य ग्रहण के सम्बन्ध में वैज्ञानिक जानकारी नही थी। आज से लगभग पन्द्रह सौ साल पहले प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ-ज्योतिषी आर्यभट ने अपनी पुस्तक आर्यभटीय में सूर्य ग्रहण का वैज्ञानिक कारण बताया हैं। आर्यभट गोलपाद में लिखते हैं:-
छादयति शशी सूर्य शशिनं महती च भूच्छाया।। 37 ।।
-गोलपाद, आर्यभटीय

अर्थात्, जब पृथ्वी की विशाल छाया चन्द्रमा पर पड़ती हैं, तो चन्द्र ग्रहण होता हैं , तथा जब चन्द्रमा तथा पृथ्वी के बीच आ जाता हैं और वह सूर्य को ढक लेता हैं, तब सूर्य ग्रहण होता हैं। आर्यभट ने ग्रहणों की तिथि तथा अवधि के आकलन का सूत्र भी प्रदान किया। उनके कई विचार क्रन्तिकारी थे। आर्यभट परम्पराओं को तोड़ने वाले खगोलकी आन्दोलन के अग्रनेता थे, इसके लिए उन्हें अपने समकालीन ज्योतिषियों के आलोचनाओं को भी झेलना पड़ा।

ये पूर्ण (खग्रास) सूर्य ग्रहण और आंशिक सूर्य ग्रहण क्या होते हैं? यदि ग्रहण के दौरान सूर्य पूरा काला दिखाई दे, तो ‘पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा’, और यदि उसका केवल एक भाग अथवा एक से अधिक भाग ही काला दिखाई दे, तो ‘आंशिक सूर्य ग्रहण’ होगा।

अब हम सूर्य ग्रहण के बारे में बहुत-कुछ जानते हैं। अब हम जानते हैं कि राहु और केतु कोई ग्रह नही हैं। तारामंडल में सूर्य और चन्द्रमा के पथ बिलकुल एक नही हैं, बल्कि थोड़े अलग हैं। जैसे गोल खरबूजे पर वृत्ताकार धारियां होती हैं, वैसे ही तारामंडल में एक धारी सूर्य का पथ हैं तथा दूसरी वाली धारी चन्द्रमा का पथ हैं। ये दोनों वृत्त जहाँ एक-दूसरें को काटते हैं, उन दो बिंदुओं को राहु और केतु कहते हैं। अत: यह ज़ाहिर हैं कि राहु-केतु कोई ग्रह नही, बल्कि खगोलशास्त्र में वर्णित दो काल्पनिक बिंदु हैं।

राशि-पथ

Zodiac-and-sky
राशि-पथ

आकाश का वह भाग जिसमे सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह एक विशेष पथ में यात्रा करते दिखाई देते हैं। इस वृत्ताकार पथ को ‘राशि-पथ’ या ‘राशिचक्र’ (Zodiac) कहते हैं। इस वृत्ताकार क्रांतिपथ को 12 भागों में बांटा गया हैं तथा उस तारामंडल में पड़नेवाले तारों की आकृति के अनुसार बेबीलोन -ज्योतिषियों ने राशि-पथ को 12 भागों में विभाजित करके ‘राशि’ का नाम दिया।

क्या आप जानतें हैं कि वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत सहित भारत के सबसे प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थ वेदांग ज्योतिष में भी 12 राशियों का कहीं पर भी कोई जिक्र नही हैं। वास्तविकता में मेष, वृष, मिथुन इत्यादि राशियाँ जो संस्कृत में हैं, वे सभी बेबीलोन के ज्योतिषशास्त्र से अपनाई गईं हैं तथा उनका भारतीय ज्योतिषियों ने संस्कृत में अनुवाद किया हैं।

जब सूर्य एक राशि सीमा से निकलकर किसी दूसरी राशि सीमा में प्रवेश करता हैं, उसे ‘संक्रान्ति’ (Solstice) कहते हैं। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि की सीमा में प्रवेश करता हैं, तब ‘मकर-संक्रान्ति’ या ‘दक्षिणायनांत’ (winter Solstice) होती हैं।

जारी हैं………

अगले भाग में:-

  • सूर्य की मृत्यु
  • सूर्य और हम